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Thursday, 17 October 2019

मानव उत्‍सर्जन तंत्र पर जीव विज्ञान के नोट्स

मानव उत्‍सर्जन तंत्र पर जीव विज्ञान के नोट्स

उत्‍सर्जन तंत्र

उत्‍सर्जन : उपापचय की प्रक्रिया के दौरान मानव शरीर से नाइट्रोजनी पदार्थों का निष्‍कासन ही उत्‍सर्जन कहलाता है। सामान्‍यत: उत्‍सर्जन से अर्थ नाइट्रोजनी उत्‍सर्जी पदार्थों जैसे यूरीया, अमोनिया, यूरिक एसिड आदि का शरीर से बाहर निकालना है।

मानव शरीर के प्रमुख उत्‍सर्जी अंग निम्‍न प्रकार हैं –

(i) वृक्‍क (किडनी) –

  • मानव एवं अन्‍य दूसरे स्‍तनधारियों का प्रमुख उत्‍सर्जी अंग एक जोड़ी वृक्‍क हैं। इसका भार 140 ग्राम है।
  • इसके दो भाग होते हैं। बाहरी भाग कोरटैक्‍स और भीतरी भाग को मेडूला कहलाता है।
  • प्रत्‍येक वृक्‍क लगभग 13,000,000 वृक्‍क नलिकाओं से मिलकर बना होता है, जो कि नेफ्रान कहलाती हैं।
  • नेफ्रान वृक्‍क की संरचनात्‍मक एवं कार्यात्‍मक इकाई है।
  • प्रत्‍येक नेफ्रॉन में एक कप नुमा संरचना होती है जिसे बोमैन सम्‍पुट कहते हैं।
  • बोमैन सम्‍पुट में पतली रूधिर कोशिकाओं का एक कोशिकागुच्छ पाया जाता है जो कि दो प्रकार की धमनियों से मिलकर बनता है।

(a) चौड़ी अभिवाही धमनी: जो रक्‍त को कोशिकागुच्‍छ तक पहुँचाती है।

(b) पतली अपवाही धमनी: इसके द्वारा रक्‍त कोशिका गुच्‍छ से वापस लाया जाता है।

  • ग्‍लोमेरुलस की कोशिकाओं से द्रव के छनकर बोमेन गुहा में पहुँचने की क्रिया को परानिस्‍पंदन कहते हैं।
  • वृक्‍कों का प्रमुख कार्य रक्‍त के प्‍लाज्‍मा को छानकर शुद्ध बनाना है, अर्थात इसमें से अनावश्‍यक और अनुपयोगी पदार्थों को जल की कुछ मात्रा के साथ मूत्र के द्वारा शरीर से बाहर निकालना है।
  • वृक्‍क को रुधिर की आपूर्ति अन्‍य अंगों की तुलना में बहुत अधिक होती है।
  • वृक्‍क में प्रतिमिनट औसतन 125 मिली रक्‍त निस्‍पंदित होता है अर्थात 180 लीटर प्रतिदिन। इसमें से 1.45 लीटर प्रतिदिन मूत्र में बदल जाता है और शेष नेफ्रान कोशिकाओं एवं रक्‍त में अवशेाषित हो जाता है।
  • सामन्‍यत: मूत्र में 95% जल, 2% लवण, 2.7% यूरीया और 0.3% यूरीक अम्‍ल होता है।
  • मूत्र का हल्‍का पीला रंग उसमें उपस्थित यूरोक्रोम के कारण होता है। यूरोक्रोम हीमोग्‍लोबिन के विखण्‍डन से बनता है।
  • मूत्र प्रकृति में अम्‍लीय होती है। इसका pH मान 6 है।
  • वृक्‍क में बनने वाली पथरी कैल्शियम ऑक्‍जलेट की बनी होती है।

(ii) त्‍वचा: त्‍वचा में पायी जाने वाली तेलीय ग्रंथियाँ एवं स्‍वेद ग्रंथियाँ क्रमश: सीबम एवं पसीने का स्‍त्रवण करती हैं।

(iii) यकृत: यकृत कोशिकाएं आवश्‍यकता से अधिक अमीनों अम्‍लों व रुधिर की अमोनिया को यूरीया में परिवर्तित करके उत्‍सर्जन में मुख्‍य भूमिका निभाती हैं।

(iv) फेफड़ें: फेफड़ा दो प्रकार के गैसीय पदार्थों कार्बन-डाइ-ऑक्‍साइड और जलवाष्‍प का उत्‍सर्जन करते हैं। कुछ पदार्थों जैसे लहसुन, प्‍याज और कुछ मसाले जिनमें वाष्‍पशील घटक होते हैं, का उत्‍सर्जन फेफड़े द्वारा ही होता है।

 

 

 

परिसंचरण तंत्र पर जीव विज्ञान नोट्स

परिसंचरण तंत्र पर जीव विज्ञान नोट्स

परिसंचरण तंत्र:

खुले परिसंचरण तंत्र के विपरीत जिसमें रक्‍त खुले अवकाशों में बहता है, मानवों में बंद परिसंचरण तंत्र पाया जाता है जहाँ रक्‍त का प्रवाह रक्‍त नलिकाओं के बंद जाल में होता है।

रक्‍त परिसंचरण की खोज वैज्ञानिक विलियम हार्वे द्वारा की गयी थी।

इसके चार भाग हैं 

(i) ह्रदय

(ii) धमनियाँ

(iii) शिरायें

(iv) रुधिर

ह्रदय:

  • हृदय एक पंपिंग अंग है जो कि एक लयबद्ध तरीक से संकुचन (आयतन कम होने) और फैलाव (आयतन बढ़ने) की च‍क्रीय प्रक्रिया में कार्य करता है।
  • इन दोनों के एक चक्र पूरा होने पर एक हृदय की धड़कन कहते है और मनुष्‍य के ह्रदय में यह चक्र पूरा होने में 0.8 सेकण्‍ड लगते हैं।
  • यह हृदयावरण में सुरक्षित रहता है।
  • इसका भार लगभग 300 ग्राम है।
  • मनुष्‍य का हृदय चार कोष्ठों का बना होता है।
  • अगले भाग में दायां आलिंद और बायां आलिंद होता है।
  • पिछले भाग में दायां निलय और बायां निलय होता है।
  • दायें आलिंद और दायें निलय के मध्‍य त्रिवलनी कपाट होती है।
  • बायें आलिंद और बायें निलय के मध्‍य द्विलनी कपाट होती है।
  • शिरायें वे रक्‍त वाहिनियाँ हैं जो रक्‍त को शरीर से हृदय की ओर ले जाती हैं।
  • शिराओं में कार्बनडाइऑक्‍साइड युक्‍त अशुद्ध रक्‍त होता है।
  • पल्‍मोनरी शिरा एक अपवाद है यह शुद्ध रक्‍त का प्रवाह करती है।
  • पल्‍मोनरी शिरा फेफड़े से बायें आलिंद में रक्‍त का प्रवाह करती है। इसमें शुद्ध रक्‍त पाया जाता है।
  • धमनियाँ वे वाहिनियाँ हैं जो सदैव हृदय से शरीर की ओर रक्‍त का प्रवाह करती हैं।
  • धमनियों में शुद्ध ऑक्‍सीजन युक्‍त रक्‍त का प्रवाह होता है।
  • लेकिन पल्‍मोनरी धमनी इसका अपवाद है यह सदैव अशुद्ध रक्‍त का प्रवाह करती है।
  • पल्‍मोनरी धमनी में रक्‍त का प्रवाह दायें निलय से फेफड़े की ओर होता है। इसमे अशुद्ध रक्‍त होता है।
  • हृदय के दाहिने भाग में, अशुद्ध (कार्बनडाइऑक्‍साइड युक्‍त) रक्‍त रहता है, जबकि हृदय के बाएं भाग में शुद्ध ऑक्‍सीजन युक्‍त रक्‍त रहता है।
  • हृदय की मांसपेशियों को रक्‍त पहुँचाने वाली धमनियों को कोरोनरी धमनी कहते हैं। इसमें किसी भी प्रकार के अवरोध आने पर हृदयाघात होता है।

परिसंचरण का मार्ग:

  • स्‍तनधारियों में द्विपरिसंचरण होता है।
  • इसका अर्थ है कि रक्‍त को पूरे शरीर में प्रवाहित होने से पूर्व हृदय से दो बार गुजरना होता है।
  • दायां आलिंद शरीर से अशुद्ध रक्‍त प्राप्‍त करता है जहाँ से यह दायें निलय में प्रवेश करता है। यहाँ से रक्‍त पल्‍मोनरी धमनी में जाता है जो इसे फेफड़े में शुद्धिकरण के लिये पहुँचाती है। शुद्धिकरण के बाद रक्‍त पलमोनरी शिरा द्वारा एक‍त्रित कर वापस हृदय में बायें आलिंद में पहुँचता है। यहाँ से रक्‍त बायें निलय में पहुँचता है। इस प्रकार का यह एक पूर्ण परिसंचरण हृदय चक्र कहलाता है।

हृदय चक्र:

  • हृदय चक्र को हृदय में दो पेसमेकरों द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
  • साइनो-आर्टियल-नोड (एसए नोड) दायें आलिंद की ऊपरी दीवार पर स्थित होता है।
  • एट्रियो-वेंट्रिकुलर नोड (एवी नोड) दायें आलिंद एवं दायें निलय के मध्‍य स्थित होता है।
  • दोनो ही पेसमेकर तंत्रिका तंत्र प्रकार के होते हैं।

रक् दाब:

  • वह दाब जो रक्‍त द्वारा रक्‍त वाहिनी नलिका पर लगाया जाता है, रक्‍त दाब कहलाता है।
  • शरीर के अंगों तक रक्‍त पहुँचाने वाली रक्‍त वाहिनियों में यह अधिक होता है (सिस्‍टोलिक दाब)
  • शरीर से हृदय तक रक्‍त पहुँचाने वाली रक्‍त वाहिनियों में कम होता है। (डायसिस्‍टोलिक दाब)
  • सामान्‍य रक्‍त दाब 120/80 mm Hg होता है।

बेतार कृत्रिम पेस मेकर:

जब एस.ए. नोड खराब या छतिग्रस्‍त हो जाता है तो हृदय की धड़कनें उत्‍पन्‍न नहीं होती हैं।

इसके समाधान लिये हम बेतार पेसमेकर का प्रयोग करते हैं जो कि अंग के बाहर बेतार पराध्‍वनिक तरंग से हृदय की धड़कन को नियंत्रित करती है।

यह पारंपरिक पेसमेकर से बेहतर है क्‍योंकि तार के खराब हो जाने की स्थिति में उसे बदलने के लिये अतिरिक्‍त सर्जरी की आवश्‍यकता नहीं पड़ती है।

हृदय से जुड़ी बीमारियाँ:

धमनी का पत्थर होना: इसमें धमनियों में सजे टुकड़ों के निर्माण और कैल्‍सीकरण के कारण धमनी की दीवारें कठोर हो जाती हैं।

एथ्रोस्केलेरोसिस: धमनियों की दीवारों में कोलेस्‍ट्रॉल के जमा होने के कारण वे पतली हो जाती हैं और जिसके कारण उनमें रक्‍त के प्रवाह में रूकावट आती है।

हृदय घात: हृदय में अचानक रक्‍त की आपूर्ति में कमी आने पर हृदय घात होता है जिसके कारण हृदय की मांसपेशी क्षतिग्रस्‍त हो जाती हैं।

 

 

 

पादप अकारिकी पर आधारित जीव विज्ञान नोट्स

पादप अकारिकी पर आधारित जीव विज्ञान नोट्स

अकारिकी:

पादप अकारिकी जीव विज्ञान की वह प्रमुख शाखा है जो पौधों के विभिन्‍न भागों के अध्‍ययन से संबंधित है। इसमें पौधों की बाह्य संरचना जैसे तना, जड़, पत्‍ती आदि का अध्‍ययन शामिल है।

जड़़:

  • प्राथमिक जड़ों का विकास मूलांकुर से होता है।
  • ये जड़ें आगे विकसित होकर तृतीयक जड़ों में रूपांतरित होती हैं।
  • जड़ों का विकास सदैव मृदा के भीतर होता है।
  • जड़ें सदैव दो प्रकार की होती हैं: मूसला जड़ें (टैप रूट) और अपस्‍थानिक जड़ें (एडवेनसियश जड़ें)

मूसला जड़ों में रूपांतरण:

जड़ रूपांतरणविवरणउदाहरण
शंक्‍वाकार (कोनिकल)शंकु के आकार मेंगाजर
कुम्‍भी रूप (नैपीफार्म)गोलाकारशलजम और चुकंदर
तर्कु रूप (फ्यूजीफार्म)मोटी और लंबीमूली
न्‍यूमैटोफोरजड़ें वायु और श्‍वसन के लिये जमीन से ऊपर की ओर उठती हैं।रिजोफोरा

अपस्‍थानिक जड़ों में रूपांतरण:

जड़ेंउदाहरण
रेशेदार जड़ेंप्‍याज
चूसन जड़ें (Sucking Roots)अमरबेल
पत्‍तेदार जड़ेंब्रायोफाइट
मोनीफार्म जड़ेंअंगूर
लट्ठा जड़ेंमक्‍का और गन्‍ना
उपरीरोहण जड़ेंफर्न
चढ़ने वाली जड़ेंपान के पत्‍ते

तना:

  • तना पौधों का वह भाग है जो ऊपर की ओर वृद्धि करता है।
  • यह प्‍लूमूल से विकसित होता है।

तने का रूपांतरण:

तनाप्रकारउदाहरण
कंद (टुबेर)भूमिगतआलू
कॉर्मभूमिगतकेसर, ग्‍लेडियोलस
लट्टू (बल्‍ब)भूमिगतप्‍याज, लहसुन
प्रकंद (राइजोम)भूमिगतअदरक, हल्‍दी

पत्‍ती अकारिकी:

इसका मुख्‍य कार्य प्रकाश संश्‍लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करना है।

पत्‍ती की रचना आधार, डंठल और पत्रदल से मिलकर होती हैं।

पत्‍ती के आधार पर पत्‍ती के आकार जैसी रचना स्‍टीपल्‍स उपस्थित होती है।

रूपांतरित पत्‍तीविवरणउदाहरण
स्‍पाइन्‍सपत्‍ती का तीव्र वृद्धिकैकटस
टेन्डिल्‍ससहारा देती हैखीरा
स्‍टीपल्‍सपत्रदल के आधार पर स्थितकाला लोकस

पुष्‍प अकारिकी:

  • यह पौधों का जनन अंग है।
  • पुष्‍प सामान्‍यत: रूपांतरित टह‍नियाँ होती हैं।

पुष्‍प के विभिन्‍न अंग इस प्रकार हैं:

पुमंग:

  • यह नर जननांग है जो कि परागकणों को विकसित करता है।
  • इसकी इकाई पुंकेसर है।
  • परागकोष और तंतु पुंकेसर के भाग होते हैं।

जायांग:

  • यह मादा जननांग है।
  • इसकी इकाई अंडप है।
  • अण्‍डाशय, वर्तिका और वतिकाग्र अंडप के भाग होते हैं।

परागण:

  • परागकणों का वतिकाग्र तक पहुँचने की प्रक्रिया को परागण कहते हैं।
  • परागण दो प्रकार से हो सकता है : स्‍व:- परागण और पर-परागण।

निषेचन:

  • नर नाभिक का अण्‍डज कोशिका से संलयन की प्रक्रिया को निषेचन कहते हैं।
  • निषेचित अण्‍डे को युग्‍मक कहते हैं।
  • आवृतबीजी में निषेचन त्रिकसंलयन जबकि अन्‍य वर्ग के पौधों में द्विसंलयन होता है।

अनिषेचक फलन:

  • बिना निषेचित हुए ही अण्‍डाशय से फल के विकास को अनिषेचक फलन कहते हैं।
  • इस प्रकार के फल प्राय: बीजरहित होते हैं जैसे – केला, पपीता, नारंगी, अंगूर, अनानास आदि।

फल एवं बीज:

  • फल निषेचन के पश्‍चात पका अण्‍डाशय है।
  • बीज निषेचन के पश्‍चात विकसित बीजाणु है।

फल को तीन भागों में बांटा जाता है:

  • सरल फल: केला, अमरूद आदि।
  • पुंज फल: स्ट्राबेरी, रसभरी आदि।
  • संग्रथित फल: कटहल, शहतूत आदि।

कुछ फल एवं उनके खाने योग्‍य भाग

फलखाने योग्‍य भागफलखाने योग्‍य भाग
सेबपुष्‍पासनपपीतामध्‍य फलभित्ति
गेंहूभ्रूणकोष और भ्रूणटमाटरफलभित्ति एवं बीजाण्‍डसन
नाशपातीपुष्‍पासननारियलभ्रूणकोष
लिचीएरिलअमरूदफलभित्ति एवं बीजाण्‍डसन
आममध्‍य फलभित्तिमूंगफलीबीजपत्र एवं भ्रूणकोष
नारंगीजुसी हेयरअनानासपरिदलपुंज
अंगूरफलभित्ति एवं बीजाण्‍डसनकेलामध्‍य एवं अंत: फलभित्ति

 

 

 

मानव रक्‍त पर आधारित जीव विज्ञान के नोट्स

मानव रक्‍त पर आधारित जीव विज्ञान के नोट्स

रक्‍त मानव एवं अन्‍य प्राणियों के शरीर में प्रवाहित होने वाला तरल है जो कि कोशिकाओं को आवश्‍यक पोषक तत्‍व और ऑक्‍सीजन की आपूर्ति करने के साथ उन्‍हीं कोशिकाओं से उपापचय अपशिष्‍ट पदार्थों का परिवहन करते हैं। रक्‍त में एण्‍टीबॉडी, पोषक तत्‍व, आक्‍सीजन और शाररिक जरूरतों की पूर्ति हेतु अन्‍य पदार्थ उपस्थित होते हैं। आइए हम विस्‍तृत रूप से मानव रक्‍त के संघटन का अध्‍ययन करते हैं।

मानव रक्‍त

  • मानव शरीर में रक्‍त की मात्रा शरीर के कुल भार का 7% है।
  • यह क्षारीय विलयन है जिसका pH मान 7.4 होता है।
  • मानव शरीर में औसतन 5-6 लीटर रक्‍त पाया जाता है।
  • रक्‍त के दो भाग होते हैं: 
    (1) प्‍लाज्‍मा, 
    (2) रक्‍त कणिकाएं

(1) प्‍लाज्‍मा

  • यह रक्‍त का तरल भाग है। रक्‍त का 60% भाग प्‍लाज्‍मा होता है। इसका 90% भाग जल, 7% प्रोटीन, 0.9% लवण और 0.1% ग्‍लूकोज होता है। शेष अन्‍य पदार्थ काफी कम मात्रा में उपस्थित होते हैं।
  • प्‍लाज्‍मा के कार्य – शरीर से पचे भोजन, हार्मोन, उत्‍सर्जी पदार्थों आदि का परिवहन प्‍लाज्‍मा के माध्‍यम से होता है।
  • सेरम – प्‍लाज्‍मा से फाइब्रिनोजन एवं प्रोटीन को निकाल देने पर शेष बचे भाग को सेरम कहते हैं।

(2) रक्‍त कणिकाएं (रक्‍त का 40% भाग)

इसको तीन भागों में बांटा जाता है:

1. लाल रक्‍त कणिकाएं (आरबीसी)

  • इसमें नाभिक का अभाव होता है। अपवाद – ऊँट और लामा।
  • आरबीसी का निर्माण अस्थि मज्‍जा में होता है। (भ्रूण अवस्‍था में इसका निर्माण यकृत में होता है।)
  • इसका जीवनकाल 20 से 120 दिन होता है।
  • इसका विनाश प्‍लीहा में होता है। इसलिये प्‍लीहा को आरबीसी की कब्रगाह कहते हैं।
  • इसमें हीमोग्‍लोबिन पाया जाता है, जिसमें लौह युक्‍त हीम नामक यौगिक पाया जाता है, इसके कारण रक्‍त का रंग लाल होता है।
  • आरबीसी का मुख्‍य कार्य सभी कोशिकाओं को ऑक्‍सीजन पहुँचाकर उससे कार्बनडाईआक्‍साइड वापस लाना होता है।
  • एनिमिया रोग का कारण हीमोग्‍लोबिन की कमी है।
  • सोते समय आरबीसी में 5% की कमी हो जाती है और 4200 मीटर की ऊँचाई पर रहने वाले लोगो के आरबीसी में 30% की वृद्धि हो जाती है।

2. श्‍वेत रक्‍त कणिकाएं (डबल्‍यूबीसी) अथवा ल्‍यूसोसाइट्स

  • इसका निर्माण अस्थि मज्‍जा, लिम्‍फ नोड और कभी-कभी यकृत और प्‍ली‍हा में होता है।
  • इसका जीवन काल 5 से 20 दिन होता है।
  • श्‍वेत रक्‍त कणिकाओं में नाभिक पाया जाता है।
  • इसका मुख्‍य कार्य शरीर की रोगो से रक्षा करना है।
  • आरबीसी और डबल्‍यूबीसी का अनुपात 600:1 है।

3. रक्‍त बिम्‍बाणु अथवा थ्रोम्‍बोसाइट्स:

  • यह केवल मानव एवं अन्‍य स्‍तनधारियों के रक्‍त में पाया जाता है।
  • इसमें नाभिक का अभाव होता है।
  • इसका निर्माण अस्थि मज्‍जा में होता है।
  • इसका जीवनकाल 3 से 5 दिन का होता है।
  • इसकी मृत्‍यु प्‍लीहा में होती है।
  • इसका मुख्‍य कार्य रक्‍त का थक्‍का बनने में मदद करना है।

रक्‍त का कार्य:

  • शरीर के तापमान को नियंत्रित करना और शरीर की रोगों से रक्षा करना आदि।
  • ऑक्‍सीजन, कार्बनडाई आक्‍साइड, पचे भोजन का परिवहन, हार्मोन का संवहन आदि।
  • शरीर के विभिन्‍न भागों के मध्‍य समन्‍वय स्‍थापित करना।

रक्‍त का थक्‍का बनाना:

  • क्लॉटिंग के दौरान निम्नलिखित प्रतिक्रियाएं होती हैं-
    (ए) थ्रोम्बोप्लास्टिन + प्रोथ्रोबिन + कैल्शियम = थ्रोम्बिन
    (बी) थ्रोम्बिन + फाइब्रिनोजन = फाइब्रिन
    (सी) फाइब्रिन + रक्त काष्ठक = थक्का
  • विटामिन K रक्त के थक्के में मददगार है।

मानव रक्‍त समूह

  • रक्‍तसमूह की खोज कार्ल लैनस्‍टीनर ने 1900 में की थी।
  • इसके लिये उन्‍हें वर्ष 1930 में नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था।
  • मानव रक्‍त समूहों में विभिन्‍नता का मुख्‍य कारण ग्‍लाइको प्रोटीन है जो लाल रक्‍त कणिकाओं में पाया जाता है। इसे एण्‍टीजन कहते हैं। एण्‍टीजन दो प्रकार के होते हैं – एण्‍टीजन A और एण्‍टीजन B
  • एण्‍टीजन अथवा ग्‍लाइको प्रोटीन की उपस्थिति के आधार पर, मानव में चार रक्‍त समूह पाये जाते हैं:
  • जिसमें एण्‍टीजन A पाया जाता है – रक्‍त समूह A
  • जिसमें एण्‍टीजन B पाया जाता है – रक्‍त समूह B
  • जिसमें एण्‍टीजन A और B पाया जाता है – रक्‍त समूह AB
  • जिसमें कोई भी एण्‍टीजन नहीं पाया जाता है – रक्‍त समूह O
  • रक्‍त के प्‍लाज्‍मा में एक विपरीत प्रकार की प्रोटीन पायी जाती है। इसे एण्‍टीबॉडी कहते हैं। यह भी दो प्रकार की होती है – एण्‍टीबॉडी a और एण्‍टीबॉडी b.
  • रक्‍त समूह O को सर्वदाता समूह कहा जाता है क्‍योंकि इसमें कोई भी एण्‍टीजन नहीं होता है।
  • रक्‍त समूह AB को सर्वग्राही समूह कहते हैं क्‍योंकि इसमें कोई भी एण्‍टीबॉडी नहीं होता है।

 

 

 

जंतु विज्ञान - Zoology

जंतु विज्ञान - Zoology

जीवों के अध्ययन को जीव विज्ञान का नाम सन 1802 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लैमार्क तथा जर्मन वैज्ञानिक ट्रेविरैनस ने दिया। जीव विज्ञानं को डो शाखाओं में बांटा गया है- वनस्पति विज्ञान तथा जंतु विज्ञान। प्राचीन कालीन ग्रीस देश के कई दार्शनिकों ने जीवों के बारे में लिखा। जंतु विज्ञान पर प्रथम लेख 5वीं सदी ईसा पूर्व का एक चिकित्सा ग्रन्थ था। इसमें खाने योग्य जंतुओं का वर्गीकरण दिया गया था।हिप्पोक्रेटस् (460-375 ई.पू.) ने मानव रोगों पर लेख लिखे। इन्हें चिकित्सा शास्त्र का जनक भी कहते हैं। चिकित्सा शास्त्र के विद्यार्थियों को आज भी उनकी शपथ दिलाई जाती है। अरस्तू (Aristotle, ३८४२२०-322 ई.पू.) ने अपनी पुस्तक जंतु इतिहास (Historia animalium) नामक पुस्तक में 500 जंतुओं की रचना, स्वभाव, वर्गीकरण जनन आदि का वर्णन किया। इसलिए इन्हें जंतु विज्ञान का जनक (Father of Zoology) कहते हैं।

गैलेन (Galen, 131-200 ई.) ने कुछ जंतुओं के अंतरांगों की कार्यिकी पर सबसे पहला प्रयोगात्मक (Experimental) अध्ययन किया। इसके बाद 13वीं सदी में एल्बर्टस मैगनस (1200-1280 ई.) के ‘जंतुओं पर’ (On Animals) नामक ग्रन्थ से जंतु विज्ञान का पुनर्जागरण हुआ। 16वीं सदी में जंतुओं के अध्ययन पर अनेक ग्रन्थ छपे। इसी सदी में सूक्ष्मदर्शी (Microscope) का अविष्कार हुआ, जिससे जीव वैज्ञानिकों ने बहुमुखी अध्ययन प्रारंभ किया। इस वैज्ञानिकों में निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं-

1. विलियम हार्वे (1578-1657) ने रुधिर परिसंचरण तंत्र (1628) एवं भ्रौणिकी का प्रयोगात्मक अध्ययन किया।

2. रॉबर्ट हुक ने सबसे पहले मृत पादप ऊतक (कॉर्क) में कोषाएं (1665) देखीं और उन्हें कोशिका की संज्ञा दी।

3. कैरोलस लिनियस ने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी (Systema Natural, 1735) पादपों एवं जंतुओं का वर्गीकरण किया और जीव-जातियों के लिए द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature, 1749) बनाई। अतः इन्हें आधुनिक वर्गिकी का जनक (Father of Modern Taxonomy) कहते हैं।

4. लैमार्क ने जैव विकास पर मत प्रतिपादन किया तथा फिलॉसफी जूलोजिक (1809) नामक पुस्तक लिखी।

5. वॉन बेयर ने तुलनात्मक शारीरिक (Comparitive Anatomy) एवं भ्रौणिकी का व्यापक अध्ययन किया, ये आधुनिक भ्रौणिकी के जनक कहलाते हैं।

6. श्लाइडेन एवं श्वान ने सन 1838-39 में कोशिका मत का प्रतिपादन किया।

7. मेंडेल ने सन 1866 में प्रसिद्द आनिवंशिकी (Genetics) के नियम बनाये।

पदार्थ एवं ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति

अन्तरिक्षी उद्विकास Cosmic Evolution सारा ब्रह्माण्ड या विश्व, पदार्थ एवं उर्जा का बना हुआ है। इसकी आयु 7 से 10 अरब वर्ष आंकी गयी है। कहते हैं की इसकी उत्पत्तिइलेम (Ylem) नामक आदि पदार्थ (primordial matter) के एक अत्यधिक तप्त (5000°-6000°C) विशाल और सघन गैसीय बदल से हुई जो न्यूट्रान, प्रोटान एवं इलेक्ट्रान का बना हुआ था। एबी लमैत्र 1931, गैमो 1948 एवं डिक 1964 की बिग-बैंग परिकल्पना (Big Bang Hypothesis) के अनुसार इस बदल में भयंकर विस्फोट हुआ, जिससे इससे वर्तमान पदार्थ के कुछ परमाणु बने। इसी के साथ अन्तरिक्षी उद्विकास (cosmic evolution) की एक लम्बी श्रृंखला प्रारंभ हुई। अन्तराल में यह बदल फैला और छोटे-छोटे गैस के अनेक पिण्डो में बंट गया। प्रत्येक पिंड से एक आकाश गंगा बनी और इसके छोटे-छोटे, चमकते पिंडों से सितारे या नक्षत्र बने। ब्रह्माण्ड के अधिकांश नक्षत्र आज भी प्रज्जवलित गैसों के पिंड मात्र ही हैं। कांट-लाप्लास मत (1796) के अनुसार और परिवार का उद्गम हमारी आकाश गंगा के एक घूर्णीय (Rotating) गैसीय पिंड से लगभग 4.5 से 5 अरब वर्ष पूर्व हुआ। इस बदल में वर्तमान पदार्थ के अनेक स्वतंत्र परमाणु (Atoms) थे। अधिकांश परमाणु हाइड्रोजन के थे। गुरुत्वाकर्षण के कारण अधिकांश  परमाणुओं ने इस पिण्ड के केन्द्रीय भाग में एकत्र होकर सूर्य बनाया। शेष ने पिण्ड की बाहरी भंवरों में पृथक समूहों में एकत्र होकर सौर परिवार के विभिन्न ग्रह बनाये।

हमारी आकाशगंगा में सूर्य के चारों ओर चक्कर काटने वाले नौ ग्रहों का सौर परिवार है। एक दसवें ग्रह की खोज हुई है। ये ग्रह हैं- बुध (Mercury), शुक्र (Venus), पृथ्वी (Earth), मंगल (Mars), वृहस्पति (Jupiter), शनि (Saturn), अरुण (Uranus), वरुण (Neptune) एवं यम या कुबेर (Pluto)। चंद्रमा पृथ्वी से टूटकर बना एक उपग्रह (Sattelite) है।

पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद इस पर जीवन की उत्पत्ति हुई। वैज्ञानिकों एवं दार्शनिकों ने समय-समय पर जीवन की उत्पत्ति के विषय में अपनी-अपनी परिकल्पनाएं प्रस्तुत की हैं।

जैव विकास Enolution

जैव विकास के प्रमाण सिद्ध करते हैं की हमारी पृथ्वी पर पहले की, पूर्वज (Ancestral) जातियों से ही उद्विकास के द्वारा, नयी-नयी जातीयां बनी हैं और बन रही हैं। जैव विकास कैसे हुआ, इसके बारे में 3 दिद्धंत हैं- लैमार्कवाद, डार्विनवाद तथा उत्परिवर्तनवाद।

लैमार्कवाद Lamarckism

जैव विकास परिकल्पना पर पहला तर्कसंगत सिद्धांत फ्रांसीसी जिव वैज्ञानिक जॉन बैप्टिस्ट डी लैमार्क (Jean-Baptiste Lamarck) ने प्रस्तुत किया, जो सन 1809 में इनकी पुस्तक फिलॉसफी जूलोजीक (Philosophie Zoologique) में छपा। इसे लैमार्क का सिद्धांत (Lamarckism) या उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धांत (theory of inheritance of acquired characteristics) कहते हैं। यह 4 मूल धारणाओं पर आधारित है-

1. बड़े होने की प्रवृत्ति Tendency to increase in size

2. वातावरण का सीधा प्रभाव  Direct effect environment

3. अंगो के अधिक या कम उपयोग का प्रभाव Effect of use and unused of organs

4. उपार्जित लक्षणों की वंशागति Inheritance of Acquired characters

डार्विनवाद Darwinism

जैव विकास के सम्बन्ध में दूसरी महत्वपूर्ण परिकल्पना डार्विनवाद के नाम से प्रसिद्द है। इसके प्रेषक दो अंग्रेज वैज्ञानिक थे- वैलेस (Alfred Russel Wallace) तथा डार्विन (Charles Darwin), जो स्वतंत्र रूप से समान निष्कर्षों पर पहुंचे।

अल्फ्रेड रसेल वैलेस (1823-1913) की जैव विकास परिकल्पना आबादी (Population), योग्यतम की उत्तरजीवता (survival of the fittest) एवं प्राकृतिक चयन (natural selection) पर आधारित था।

चार्ल्स डार्विन को सन 1813 में 21 वर्ष की आयु में, इन्हें बिर्टिश सरकार ने अपने एच.एम.एस बीगल (HMS Beagle) नामक विश्व सर्वेक्षण जहाज (ship) पर प्रकृति-वैज्ञानिक का कम सौंपा। अतः 5 साल इन्होंने द्वीपों एवं महाद्वीपों का सर्वेक्षण किया। अनेक जीव-जंतु, चट्टानें तथा जीवाश्म एकत्र इए और इन पर टिप्पणियां लिखीं। वैलेस के विचार इन्हीं के विचारों से मिलते जुलते थे। अतः इन्होंने अपने तथा वैलेस के संयुक्त नाम से इस परिकल्पना को छपवाया। अगले वर्ष (1859) इस सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या इन्होंने अपनी पुस्तक प्राकृतिक वरण द्वारा जातियों की उत्पत्ति (On the Origin of Species by means natural selection) में छपी।

डार्विनवाद की संक्षिप्त व्याख्या

1. जीवों में प्रचुर संतानोत्पत्ति की क्षमता Enormous fertility

2. प्रत्येक जीव जाति की स्थायी, संतुलित आबादी Constant population

3. जीवन संघर्ष Struggle for variation and inheritance

4. योग्यतम की उत्तरजीविता Survival of the fittest

उत्परिवर्तनवाद Mutation Theory

डार्विनवाद और इनसे पहले के कुछ वैज्ञानिकों ने पादपों के कुछ ऐसे लक्षण देखे, जो पीढ़ी दर पीढ़ी  क्रमिक विकास के द्वारा नहीं वरन अकस्मात् ही पूर्ण विकसित दशा में प्रदर्शित हो जाते हैं और अगली पीढ़ी में वंशागत होते हैं। डार्विन ने इन्हें नवोदय प्रदर्शन (sport) और बेटसन (1894) ने विच्छिन्न विभिन्नताएं (Discontinuous or salutatory variation) कहा।

हालैंड के ह्यूगो डी ब्रीज (Hugo de Vries) ने जातीय लक्षणों में अकस्मात् हो जाने वाले इन वंशागत परिवर्तनों को उत्परिवर्तन (Mutation) नाम दिया, अपने प्रयोगों के आधार पर उन्होंने सन 1901 में नयी जीव जातियों की उत्पत्ति के बारे में एक नया मत उत्परिवर्तनवाद सिद्धांत  या उत्परिवर्तनवाद प्रेरित किया। इस सिद्धांत की 5 प्रमुख मूल बातें थीं-

1. नयी जीव-जातियों की उत्पत्ति लक्षणों में छोटी-छोटी व् अस्थिर (small and fluctuating) विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी संचय (Accumulation)   एवं क्रमिक विकास के फलस्वरुप नहीं होती, वरन एक ही बार में स्थायी अर्थात वंशागत आकस्मिक उत्परिवर्तनों के फलस्वरूप होती है।

2. जाति का पहला सदस्य जिसमें उत्परिवर्तित लक्षण विकसित होता है, उत्परिवर्तक (Mutant) कहलाता है। यह उत्परिवर्तित लक्षण के लिए शुद्ध नस्ली (Pure-Breeding) होता है।

3. उत्परिवर्तन अनिश्चित (indeterminate) होते हैं। ये किसी अंग में या एक से अधिक अंगों में हो सकते हैं। इनके फलस्वरूप अंग अचानक अधिक या कम विकसित, या पुरे विलुप्त हो सकते हैं, या नए अंग बन सकते हैं। अतः ये उत्परिवर्तन के लिए लाभदायक हो सकते हैं या हानिकारक।

4. सभी जीव-जातियों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृति (Inherent tendency) होती है, जो कभी बहुत कम, कभी बहुत अधिक और कभी बिलकुल लुप्त होती है।

5. जाति के विभिन्न सदस्यों में भिन्न-भिन्न प्रकार केउत्परिवर्तन हो सकते हैं, अतः एक जनक या पूर्वज जाति से एक ही साथ कई मिलती-जुलती जातियों की उत्पत्ति हो जाती है।

जैव-विकास से सम्बंधित कुछ नियम

1. एलेन का नियम Allen’s Rule- अधिकारिक ठंडे प्रदेशों में रहने वाली जंतु-जातियों में शारीर के खुले भाग जैसे पूंछ, कान, पाद आदि क्रमशः चोतेहोते जाते हैं, ताकि इनके माध्यम से ताप की कम हानि हो।

2. बर्गमान का नियम (Bergmann’s Rule)- नियततापी (Warm-blooded) जंतुओं में ठंडे प्रदेशों में रहने वाले सदस्यों का शरीर अधिकाधिक बड़ा होता जाता है।

3. कोप का नियम Cope’s Rule- जैव विकास के लम्बे इतिहास में जंतुओं के शरीर के अधिकाधिक बड़े होते रहने की प्रवृत्ति रही है।

4. डोलो का नियम Dollo’s Law- जैव विकास के दौरान लक्षणों में जो प्रमुख भेद हो चुके हैं, वे दुबारा नहीं हो सकते, अर्थात जैव विकास उलटी दिशा में कभी नहीं बढ़ता है।

5. ग्लोगर का नियम Gloger’s Law-  गर्म व् नम प्रदेशों के नियततापी जंतुओं में मिलेनिन (Milanin) उत्पाद अधिक होता है।

6. गॉस का नियम Gause’s Law- ऐसी डो जीव जातियां जिनकी पर्यावरणीय आवश्यकताएं बिलकुल एकसमान होती है, अनिश्चितकल तक एक ही स्थान पर नहीं बनी रह सकतीं।

क्या जैव विकास अब भी हो रहा है?

वास्तव जैव विकास कभी ण समाप्त होने वाली प्रक्रिया है, परन्तु आधुनिक वैज्ञानिकों का विचार है की भविष्य में मानव जाति के सांस्कृतिक विकास (cultural evolution of man) का जैव विकास पर काफी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। अन्य जीव जातियों की आबादी का विस्तार, इनका विकास या विलोप आदि बहुत कुछ मानव की इच्छा पर निर्भर करने लगेगा। इसका कारण यह है कि वातावरण की बदलती दशाओं के अनुसार अपने आप को अनुकूलित करने के विपरीत मानव में अपनी आवश्यकताओं के अनुसार वातावरणीय दशाओं को ही बदल देने की क्षमता बढती जा रही है। कृषि, औद्योगिकीकरण आदि के उत्तरोत्तर विकास के फलस्वरूप अनेक क्षेत्रों में वातावरणीय दशाएं बदल डी जाती हैं। दुसरे मानव अपने उपयोग के लिए अनेक जीव- जातियों को कृत्रिम वातावरण में पालता और कृत्रिम चयन भी करता है या विनाशक रसायनों द्वारा हानिकारक आबादियों का विनाश करने का प्रयास करता है।

 

 

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