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Wednesday, 23 January 2019

बालासाहेब केशव ठाकरे

बालासाहेब केशव ठाकरे
( अंग्रेज़ी: Bal Thackeray , जन्म:
23 जनवरी , 1926 ; मृत्यु: 17 नवंबर , 2012 ) भारत के महाराष्ट्र राज्य के प्रसिद्ध राजनेता थे। उन्होंने शिव सेना नामक हिन्दू राष्ट्रवादी दल का गठन किया।
जीवन परिचय
बाल ठाकरे का जन्म तत्कालीन बॉम्बे रेजिडेंसी के पुणे में
23 जनवरी 1926 को एक मराठी परिवार में हुआ था। बाल ठाकरे का जन्म नाम बाल केशव ठाकरे था। बालासाहब ठाकरे और हिंदू हृदय सम्राट के नाम से भी उन्हें जाना जाता है। बाल ठाकरे हिंदूवादी राजनीति पार्टी 'शिव सेना' के संस्थापक हैं। उनकी पार्टी की महाराष्ट्र में अच्छी पकड़ है और बाहरी लोगों के विरोध के कारण उन्हें ज्यादा पहचान मिली
कैरियर की शुरुआत कार्टूनिस्ट के रूप में 'द फ्री प्रेस जर्नल' के साथ एक कार्टूनिस्ट के रूप में की. 1960,  में बाल ठाकरे ने कार्टूनिस्ट की यह नौकरी छोड़ दी और अपना राजनीतिक साप्ताहिक अखबार मार्मिक निकाला. बाल ठाकरे के कार्टून 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में भी हर रविवार को छपा करते थे.
उनका राजनीतिक दर्शन उनके पिता से प्रभावित है. उनके पिता केशव सीताराम ठाकरे 'संयुक्त महाराष्ट्र मूवमेंट' के जाने-पहचाने चेहरा थे. बाल ठाकरे के पिता केशव सीताराम ठाकरे ने भाषायी आधार पर महाराष्ट्र राज्य के निर्माण में अच्छा योगदान दिया.
मार्मिक के माध्यम से बाल ठाकरे ने मुंबई में गुजरातियों, मारवाडियों और दक्षिण भारतीय लोगों के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ मुहिम चलायी.
1966 में बाल ठाकरे ने मुंबई के राजनीतिक और व्यावसायिक परिदृष्य पर महाराष्ट्र के लोगों के अधिकार के लिए राजनीतिक पार्टी 'शिव सेना' का गठन किया. बाल ठाकरे शिव सेना के मुखपत्र मराठी अखबार 'सामना' और हिन्दी अखबार 'दोपहर का सामना' के फाउंडर हैं.
हिटलर और लिट्टे का किया समर्थन
बाल ठाकरे ने एक कलाकार और जनोत्तेजक नेता के रूप में हिटलर की तारीफ करके विवादों के साथ नाता जोड़ा. 1990 के दशक में श्रीलंका में आतंक का प्रयाय बने लिट्टे को खुला समर्थन देने को लेकर भी उनकी खूब आलोचना हुई. वेलेंटाइन डे के विरोध में लड़के-लड़कियों की खुलेआम पिटाई को लेकर भी बाल ठाकरे आलोचना झेल चुके हैं.
बाल ठाकरे की पत्नी का नाम मीना ठाकरे था, जिनका 1996 में देहांत हो गया. उनके तीन बेटे स्वर्गीय बिंदुमाधव, जयदेव और उद्धव ठाकरे हैं. उनके बड़े बेटे बिंदुमाधव ठाकरे की एक रोड एक्सीडेंट में 20 अप्रैल 1996 को मुंबई-पुणे हाइवे पर मौत हो गई थी.
शुरुआती दिनों से ही शिवसेना ने डर और नफरत की राजनीति की. सत्ताधारी पार्टियां तक उनसे डरती थीं, लेकिन बाद में यह डर कम हो गया. शिवसेना के गठन के बाद भी पार्टी का मुख्य उद्देश्य मराठी लोगों के लिए दक्षिण भारतीय लोगों, गुजरातियों और मारवाडियों से काम की सुनिश्चितता था.
वोट डालने तक का प्रतिबंध झेल चुके हैं ठाकरे
अपने हिन्दूवादी एजेंडे का साथी शिवसेना को बीजेपी के रूप में मिला और दोनों ने मिलकर 1995 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव जीता. 1995 से 1999 तक शिवसेना नेता मनोहर जोशी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन बाल ठाकरे पर पर्दे के पीछे से रिमोट की तरह काम करने का आरोप लगता रहा. बीजेपी-शिवसेना की इस सरकार में बीजेपी नेता गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री रहे.
28 जुलाई 1999 को बाल ठाकरे पर चुनाव आयोग की सिफारिश पर 6 साल के लिए वोट डालने और चुनाव लड़ने का बैन लगा दिया गया था. हालांकि 2005 में उन पर से 6 साल तक लगे बैन को हटा लिया गया और उन्होंने इसके बाद पहली बार 2006 में बीएमसी चुनाव के लिए वोट डाला.
बाल ठाकरे हमेशा मराठी मानुष की लड़ाई लड़ते रहे. उन्होंने मुंबई पर मराठियों का पहला अधिकार बताते हुए बाहरी लोगों को यहां से खदेड़ने का काम किया. 2002 में ठाकरे ने मुस्लिम हिंसा के विरोध में हिंदू आत्घाती दस्ता बनाने का आह्वान किया. बाल ठाकरे के इस तरह के आह्वान पर कार्यवाई करते हुए महाराष्ट्र सरकार ने उनके खिलाफ दो समुदायों के बीच शत्रुता फैलाने का केस दर्ज किया. हालांकि बाद में बाल ठाकरे ने साफ किया कि वे हर मुसलमान के खिलाफ नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि वे तो उन मुसलमानों के खिलाफ बोल रहे थे जो देश का खाते हैं, लेकिन देश का कानून नहीं मानते. उन्होंने कहा कि मैं ऐसे लोगों को देशद्रोही मानता हूं. 1980 के दशक में बाल ठाकरे ने मुसलमानों की तुलना कैंसर (बीमारी) से करते हुए कहा कि वे कैंसर की तरह फैल रहे हैं. देश को उनसे बचाया जाना चाहिए.
हिंदू प्रेमी और मुसलमान विरोधी बयानों से राजनीति
2008 में उन्होंने एक बार फिर मुसलमानों पर हमला करते हुए कहा कि मुस्लिम आतंकवाद लगातार फैल रहा है और हिन्दू अतिवाद से ही इससे छुटकारा पाया जा सकता है. इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि हमें भारत और हिन्दुओं को बचाने के लिए हिन्दू आत्मघाती दस्तों की जरूरत है. 6 मार्च 2008 को बाल ठाकरे ने मुंबई में रोजी रोटी कमाने के लिए गए बाहरी लोगों के खिलाफ एक बार फिर आग उगली. उन्होंने बिहारी लोगों को महाराष्ट्र में अवांछनीय बताते हुए शिव सेना के मुखपत्र सामना में लिखा, 'एक बिहारी, सौ बीमारी.'
बाल ठाकरे ने कहा कि वे हिटलर के प्रशंसक हैं और उन्हें ऐसा कहने में कोई शर्म नहीं है. उन्होंने कहा कि वे हिटलर और खुद में कई समानताएं देखते हैं. उन्होंने कहा कि भारत को भी एक तानाशाह की जरूरत है. उन्होंने हिटलर के बारे में कहा कि हिटलर कई मायनों में कमाल था. उसके अंदर लोगों को साथ लेकर चलने की अतुलनी क्षमता थी. वह अपने आप में एक जादू था. हिटलर की तारीफों के बीच हालांकि बाल ठाकरे, हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्ल की भर्त्सना भी करते हैं. लेकिन उन्हें सारी बुराईयों के बीच भी हिटलर एक कलाकार के रूप में पसंद है.
शिवसेना का शाब्दिक अर्थ 'शिव की सेना' है. शिव से अर्थ महान मराठा शिवाजी से है. इन दिनों बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. शिवसेना के कार्यकर्ताओं को शिव सैनिक कहा जाता है और वे पार्टी के सभी मूलभूत कामों को बखूबी निभाते हैं. बीमारी के चलते पिछले कुछ समय से बाल ठाकरे ने स्वयं को पार्टी के दैनिक कार्यों से अलग कर लिया है.
भय और धमकी से राज करने वाले नेता की छवि
20 नवंबर 2009 को शिव सैनिकों ने मराठी चैनल आईबीएन-लोकमत और हिन्दी चैनल आईबीएन-7 पर पुणे और मुंबई में हमला किया और उनके ऑफिस में जमकर तोड़फोड़ की. बीबीसी ने बाल ठाकरे के बारे में लिखा कि वे पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र के बेताज बादशाह हैं.
वाशिंगटन पोस्ट ने बाल ठाकरे के बारे में लिखा कि वे शिकागो पर राज करने वाले अल कैपन की तरह हैं जो बॉम्बे पर भय और धमकी से राज करते हैं. दक्षिण भारतीयों के खिलाफ 1960 और 70 के दशक में बाल ठाकरे के नेतृत्व में शिव सेना ने 'लुंगी हटाओ पुंगी बजाओ' अभियान चलाया. 1992 में आयोध्या में बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिराये जाने से पहले भी बाल ठाकरे ने सामना में भडकाऊ लेख लिखा.
जैक्सन के प्रेम और गुलाम अली से बैर
1996 में पॉप स्टार माइकल जैक्सन एक कन्सर्ट के लिए मुंबई आए और शिव सेना ने उनका बड़ी ही गर्मजोशी से स्वागत किया. माइकल जैक्सन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के घर गए और कहा जाता है कि उन्होंने उस टॉयलेट सीट पर ऑटोग्राफ भी दिया, जिसका उन्होंने इस्तेमाल किया था.
1993 में बाल ठाकरे ने कहा कि अगर मुझे गिरफ्तार किया गया तो पूरा देश उठ खड़ा होगा. अगर मेरी वजह से एक पवित्र युद्ध होता है तो फिर इसे होने दें. 25 जुलाई 2000 को मुंबई उस समय ठहर गई जब बाल ठाकरे को 1993 दंगों के दौरान मुसलमानों पर हमले करने के लिए उकसाते हुए सामना में लेख लिखने के लिए गिरफ्तार किया गया.
उन्होंने खुद को पुलिस के हवाले किया और उन्हें कोर्ट में पेश किया गया. मजिस्ट्रेट ने मामले को दर्ज कर दिया और बाल ठाकरे छूट गए. 2007 में बाल ठाकरे को शिव सेना की एक रैली में भड़काऊ भाषण देने के लिए गिरफ्तार किया गया, लेकिन तुरंत ही उन्हें जमानत मिल गई. बाल ठाकरे के इशारे पर ही शिव सैनिकों ने पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली के कनसर्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया.
बाल ठाकरे से अलग हुए राज ठाकरे
2006 में बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ दी. बाद में उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना बना ली. बाल ठाकरे से गहराई से प्रभावित राज ठाकरे भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए बाहरियों के खिलाफ आग उगलते रहते हैं और मराठी मानुष का राग अलापते हैं. नवंबर 2009 में बाल ठाकरे के गुस्से का शिकार बने क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर. उन्होंने तेंदुलकर की आलोचला की और सचिन से क्रिकेट के मैदान तक ही सीमित रहने को कहा.
सचिन ने कहा था कि मुंबई पर सभी भारतवासियों का हक है. इस बार बाल ठाकरे ने कहा कि हमें क्रिकेट के मैदान में आपके छक्के-चौक्के पसंद हैं, लेकिन आप अपनी जुबान का इस्तेमाल न करें. हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे.
बाल ठाकरे ने शाहरुख खान की फिल्म 'माइ नेम इज खान' का सार्वजनिक बहिष्कार किया और 'किंग' खान को देशद्रोही तब बताया. दशहरे के मौके पर बाल ठाकरे हमेशा मध्य मुंबई में स्थित शिवाजी पार्क से शिवसैनिकों को संबोधित करते रहे हैं. इस साल वे दशहरा रैली में नहीं पहुंचे.

Monday, 30 April 2018

Target IAS 2018 - सही रणनीति और लगन से सच करें सपने

Target IAS 2018 - सही रणनीति और लगन से सच करें सपने

भले ही आज हमारे देश में कॅरियर ऑप्शन के रूप में युवाओं के पास कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रतिष्ठा आज भी उतनी ही बरकरार है जैसी पहले थी, देश में लाखों युवा हर साल सिविल सर्विस के अपने सपने को साकार करने के लिए परीक्षा में शामिल होते हैं लेकिन कहते हैं कि सफलता उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान और हौसलों में उड़ान होती है। देश की इस प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता के लिए किस तरह से युवा अपनी नीतियां बनाकर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। सिविल सेवा जितनी आकर्षक है, इस परीक्षा में सफल होना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। देश भर से सुयोग्य व महत्वाकांक्षी युवा इस परीक्षा में बैठते हैं, परन्तु सफलता कुछ लोगों के हाथ ही लगती है। अभ्यार्थियों की विशाल संख्या इस प्रतियोगिता को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाती है तथा योग्यतम का चुनाव करती है। यह परीक्षा कुछ इस प्रकार है कि इसमें वही अभ्यार्थी सफल हो पाते हैं जो सुनिश्चित रणनीति तथा योजना बना कर चलते हैं। इसीलिए आवश्यक है कि अभ्यार्थी सर्वप्रथम एक सटीक रणनीति का निर्माण करें तथा उस रणनीति के अनुरूप तैयारी को दिशा दें।

 

अचूक रणनीति से आसान होगा लक्ष्य

किसी भी महत्वपूर्ण कार्य की तरह सिविल सेवा में भी सफलता की प्राप्ति इस बात पर निर्भर करती है कि सफलता प्राप्ति के लिये किस प्रकार की रणनीति बनाई गई है। एक अच्छी रणनीति अच्छे प्रारम्भ का द्योतक है तथा कहा भी गया है कि अचूक रणनीति के निर्माण एवं गंभीरतापूर्वक उसके अनुपालन द्वारा सिविल सेवा परीक्षा में सफलता पाने की सम्भावना पर्याप्त रूप से बढ़ जाती है।

 

वक्त के साथ रणनीति बदलने की जरूरत

सिविल सेवा परीक्षा हेतु अच्छी रणनीति वह है जो परीक्षा की प्रकृति को ध्यान में रखकर बनाई गयी हो तथा साथ ही साथ अभ्यर्थी के सकारात्मक व नकारात्मक पक्षों को भी पर्याप्त महत्व दे। रणनीति तभी अचूक कही जाएगी जब उसमें तैयारी के प्रत्येक आयाम को स्थान दिया जाए। इसके अंतर्गत लक्ष्य निर्धारण से लेकर, विषयों के चुनाव, अध्ययन सामग्री के चयन, समय प्रबंधन के महत्व, प्रभावी अध्ययन पद्धति अपनाने, उपयोगी नोट्स के निर्माण, कोचिंग संस्था का चयन, परिचर्चा को प्रभावशाली बनाने, मोक टेस्ट, पुनरावलोकन आदि सभी को उचित महत्व देना चाहिए। सिविल सर्विस क्लब के समन्वयक लक्ष्मीशरण मिश्रा बताते हैं कि पिछले कुल सालों में सिविल सर्विस की परीक्षा के पैटर्न में काफी बदलाव आया है। सवाल पूछने का पैटर्न भी बोर्ड द्वारा इस प्रकार से तैयार किया जाता है जिसमें प्रतिभागी के ज्ञान को नहीं बल्कि उसकी समझ को देखने का प्रयास किया जाता है। आशय साफ है कि अब आप सिर्फ अपने नॉलेज के सहारे नहीं बल्कि अपनी समझ के सहयोग से ही सिविल सर्विस की परीक्षा को फाइट कर सकते हैं।

 

यह गुण तलाशने का प्रयास

सिविल सर्विस की परीक्षा के माध्यम से देश के लिए ऐसे युवाओं को खोजने का प्रयास नए पैटर्न के माध्यम से किया जा रहा है जो समस्याओं को समझकर तुरंत निर्णय लेकर काम कर सकें इसके लिए कुछ बुनियादी बातों का खास तौर पर मूल्यांकन किया जाता है।

 

1. बुनियादी ज्ञान हो - देश की इस सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा के माध्यम से चुने जाने वाले युवाओं से उम्मीद की जाती है कि उन्हें अपने देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति से लेकर देश-विदेश के तत्कालीन घटनाक्रमों का बुनियादी ज्ञान अवश्य हो।

2. देश-दुनिया की हो समझ - किसी भी घटना को लेकर व्यक्ति पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है जिसमें देश-दुनिया, समाज के प्रति समझ क्या है उसे जानने का प्रयास किया जाता है, इसलिए समसामयिक मुद्दों और बेसिक नॉलेज दोनों का ही होना बहुत महत्वपूर्ण है।

3. प्रतिक्रियात्मक रवैया - सिविल सर्विस में आने के बाद व्यक्ति को हर स्तर पर कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, ऐसे में किसी भी घटना को लेकर उसकी क्या प्रतिक्रिया है। किसी भी मुद्दे पर उसके स्वयं के क्या विचार हैं। यह जानने का प्रयास किया जाता है, इसलिए समसामयिक मुद्दों पर अपने स्वयं के विचार प्रकट करने और लिखने की समझ विकसित करना जरूरी है।

4. विश्लेषण क्षमता है जरूरी - सिविल सर्विस में आने के बाद अधिकारी को समय परिस्थितियों के अनुसार तत्काल निर्णय लेना पड़ता है, इसलिए इस परीक्षा के माध्यम से व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता को जांचा जाता है। इसलिए अपनी डिसिजन मेकिंग की क्षमता को विकसित करें।

5. अभिव्यक्ति की हो क्षमता - सिविल सर्विस में आने वाले व्यक्ति की मौखिक और लिखित दोनों ही तरह की अभिव्यक्ति किसी भी मुद्दे पर स्पष्ट होनी चाहिए। ताकि वह किसी भी समस्या को पहले समझें फिर पूरे विश्लेषण के पश्चात उसका समाधान निकाल सकें, यही एक अच्छे प्रशासनिक अधिकारी के मुख्य गुण हैं।

 किन किताबों का अध्ययन होगा उचित

देश के सबसे ज्यादा जिम्मेदार युवाओं के चयन के लिए होने वाली इस सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा के लिए अध्ययन सामग्री की आज किताबों, नोट्स और इंटरनेट पर स्टडी मटेरियल की कहीं कोई कमी नहीं है लेकिन हमें ऐसी किताबों का अध्ययन करने की आवश्यकता है जो हमें हमारी आवश्यकताओं के अनुरूप ज्ञान प्रदान करें।

कॉन्सेप्ट क्लीयर करें एनसीईआरटी बुक्स से -

अपने बेसिक क्लीयर करने के लिए प्रतिभागियों को सबसे पहले एनसीईआरटी की 8वीं से 12वीं क्लास की इतिहास, भूगोल, राजनीति शास्त्र, जीव विज्ञान, रसायन शास्त्र और भौतिक शास्त्र की किताबों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

इन किताबों से विषय का सही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ ही कॉलेज में ग्रेजुएशन लेवल पर पढ़ाई जाने वाली किताबों का सही ढंग से अध्ययन करना आवश्यक है।

इतिहास - भारतीय स्वाधीनता आंदोलन विपिन चन्द्रा

बी.एल. ग्रोवर - आधुनिक भारत का इतिहास

भूगोल - भारत का भूगोल - बी.आर. खुल्लर, भारत एवं विश्व का भूगोल - प्रो. माजिद हुसैन।

भारतीय संविधान के लिए - हमारा संविधान - सुभाष कश्यप, डी.डी. बसु - भारत का संविधान।

भारतीय अर्थव्यवस्था - मिश्रा एवं पुरी, भारतीय अर्थव्यवस्था - दत्त एवं सुंदरम्।

सामान्य अध्ययन के लिए - नोट्स बनाने के बजाय समसामयिक मुद्दों पर अपने नोट्स बनाएं ।

प्रश्नमंच और निबंध प्रतियोगिता करेंगी मदद - यदि आपका लक्ष्य सिविल सर्विस में जाना है तो आप स्कूल लेवल पर हों या फिर कॉलेज लेवल पर क्विज कॉम्प्टीशन में हिस्सा लेने की आदत डालें, इस तरह की प्रश्नमंच प्रतियोगिताएँ आपके ज्ञान और आत्मविश्वास दोनों को बढ़ाएँगी। इसके साथ ही निबंध प्रतियोगिताओं के माध्यम से अपनी लेखन कला को समृद्ध बनाएं।

बेसिक क्लीयर करें और रेग्युलर स्टडी करें

रेग्युलर स्टडी के साथ ही बेसिक कॉन्सेप्ट क्लीयर कर सिविल सर्विस में सफलता प्राप्त की जा सकती है। न्यूज पेपर को रेग्युलर ध्यान से पढ़ने की आवश्यकता है राजनैतिक खबरों पर खास ध्यान न देकर सरकारी योजनाओं संबंधी खबरों, विज्ञान प्रौद्योगिकी, कला और साहित्य से जुड़ी खबरों, अंतर्राष्ट्रीय संबंध की खबरों को ध्यान से पढ़कर उन्हें नोट्स के रूप में नियमित सहेज कर रखें। इसके साथ ही कुरुक्षेत्र, योजना, प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर मौजूद प्रेस समाचार का अध्ययन, इंडिया ईयर बुक का अध्ययन भी काफी मददगार होगा। इसके साथ ही सब्जेक्ट मटेरियल भी एक्सपर्ट की मदद लेकर सिलेक्टिव ही चूज करें इसमें इग्नू का स्टडी मटेरियल अच्छा ऑप्शन है। इन सबके साथ ही नियमित पढ़ाई बहुत जरूरी है क्योंकि सक्सेस का कोई शॉर्टकट नहीं होता है।

 

भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के सपने देखने वाले युवा अपनी सही रणनीति के माध्यम से अपने सपने को सच कर सकते हैं। इस परीक्षा से जुड़ी सभी जानकारी यू.पी.एस.सी. की वेबसाइट www.upsc.gov.in पर प्राप्त की जा सकती है।

 

दीजिये अपने जीवन को एक नयी शुरुआत .....
और लिख दीजिये मेहनत की कलम से सफलता की एक ऐसी इबारत की जो आपको एक नयी ऊंचाइयों पर ले जाये ......

  " गगन को झुका के धरा के चरणों पर धर सकता है
     इन्सान ठान ले तो फिर क्या नही कर सकता है. "

Tuesday, 5 September 2017

स्वामी विवेकानंद के बारे में



आज से 152 साल पहले हमारे देश में एक ऐसे सन्यासी ने जन्म लिया था जिसने समूची दुनिया को भारत के प्राचीन ज्ञान की रौशनी से जगमग कर दिया। 12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता में हुआ था। डेढ़ सौ साल में वक्त बदल गया, विरासत और सियासत बदल गई। एक गुलाम मुल्क, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन गया. आज हम आपको और उनके जीवन से जुड़े कुछ रोचक किस्से बताएंगे जो आपने आज तक नहीं पढ़े होंगे

1. स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के एक रूढ़िवादी हिन्दु परिवार में हुआ था।

2. वास्तव में उनकी मां ने उनका नाम वीरेश्वर रखा था तथा उन्हें अक्सर बिली कहकर बुलाया जाता था। बाद में उनका नाम नरेंद्रनाथ दत्त रखा गया।

3. भारत में स्वामी विवेकानंद के जन्मदिवस (12 जनवरी) को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

4. उनके पिता की मृत्यु के बाद स्वामी जी के परिवार ने बहुत गरीबी में जीवन बिताया। एक दिन के भोजन के लिए उनकी मां और बहन को बहुत संघर्ष करना पड़ता था। कई बार स्वामी जी दो दो दिनों तक भूखे रहते थे ताकि परिवार के अन्य लोगों को पर्याप्त भोजन मिल सके।

5. बी.ए. की डिग्री होने के बावजूद स्वामी विवेकानंद को नौकरी की खोज में भटकना पड़ा। वे लगभग नास्तिक बन चुके थे क्योंकि भगवान से उनका विश्वास हिल गया था।

6. स्वामी विवेकानंद के गुरु का नाम रामकृष्ण परमहंस था। स्वामी जी ने कभी भी उनपर पूर्ण रूप से विश्वास नहीं किया। वे प्रत्येक बात पर रामकृष्ण की परीक्षा लेते थे और अंतत: अपना उत्तर प्राप्त करके ही रहते थे।

7. खेत्री के महाराजा अजीत सिंह स्वामीजी की मां को आर्थिक सहायता के तौर पर नियमित रूप से 100 रूपये भेजते थे। यह प्रबंध एकदम गोपनीय था।

8. सन् 1893 में अमेरिका स्थित शिकागो में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वामी जी ने अपने भाषण की शुरुआत ‘मेरे अमरीकी भाइयों एवं बहनों’ के साथ की थी, इसी प्रथम वाक्य ने सभी का दिल जीत लिया था।

9. स्वामी जी में इतनी सादगी थी कि 1896 में तो उन्होंने लंदन में कचौरियां तक बना दी थीं।

10. 11 सितम्बर को “विश्व भाईचारा दिवस” मनाया जाता है। इसी दिन स्वामी विवेकानंद ने शिकागो धर्म संसद में अपना भाषण दिया था। विडम्बना यह है कि 11 सितम्बर को ही वर्ष 2001 में इतिहास का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला हुआ।

11. स्वामी विवेकानंद ने भविष्यवाणी की थी कि वे 40 वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर सकेंगे। उनकी यह बात तब सच साबित हो गई जब 4 जुलाई 1902 को उनकी मृत्यु 39 वर्ष की उम्र में ही हो गई। उन्होने समाधि की अवस्था में अपने प्राण त्यागे। उनके निधन की वजह तीसरी बार दिल का दौरा पड़ना था।

12. स्वामी विवेकानंद को 31 बीमारियाँ थी एक बीमारी उनका निद्रा रोग से ग्रसित होना था। उन्होंने 29 मई, 1897 को शशि भूषण घोष के नाम लिखे पत्र में कहा था कि मैं अपनी जिंदगी में कभी भी बिस्तर पर लेटते ही नहीं सो सका।

स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े रोचक किस्से और उनके ऐसे जवाब जिन्‍हें सुनकर झुक गया पूरा संसार :

1. अपनी भाषा पर गर्व

एक बार स्वामी विवेकानंद विदेश गए जहाँ उनके स्वागत के लिए कई लोग आये हुए थे उन लोगों ने स्वामी विवेकानंद की तरफ हाथ मिलाने के लिए हाथ बढाया और इंग्लिश में HELLO कहा जिसके जवाब में स्वामी जी ने दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते कहा… उन लोगो को लगा की शायद स्वामी जी को अंग्रेजी नहीं आती है तो उन लोगो में से एक ने हिंदी में पूछा “आप कैसे हैं”?? तब स्वामी जी ने कहा “आई एम् फ़ाईन थैंक यू”

उन लोगो को बड़ा ही आश्चर्य हुआ उन्होंने स्वामी जी से पूछा की जब हमने आपसे इंग्लिश में बात की तो आपने हिंदी में उत्तर दिया और जब हमने हिंदी में पूछा तो आपने इंग्लिश में कहा इसका क्या कारण है ?

तब स्वामी जी ने कहा……..जब आप अपनी माँ का सम्मान कर रहे थे तब मैं अपनी माँ का सम्मान कर रहा था और जब आपने मेरी माँ का सम्मान किया तब मैंने आपकी माँ का सम्मान किया.

यदि किसी भी भाई बहन को इंग्लिश बोलना या लिखना नहीं आता है तो उन्हें किसी के भी सामने शर्मिंदा होने की जरुरत नहीं है बल्कि शर्मिंदा तो उन्हें होना चाहिए जिन्हें हिंदी नहीं आती है क्योंकि हिंदी ही हमारी राष्ट्र भाषा है हमें तो इस बात पर गर्व होना चाहिए की हमें हिंदी आती है…..

क्या आपने किसी देश को देखा है जहाँ सरकारी काम उनकी राष्ट्र भाषा को छोड़ कर किसी अन्य भाषा या इंग्लिश में होता हो……..यहाँ तक की जो भी विदेशी मंत्री या व्यापारी हमारे देश में आते हैं वो अपनी ही भाषा में काम करते हैं या भाषण देते हैं फिर उनके अनुवादक हमें हमारी भाषा या इंग्लिश में अनुवाद करके समझाते हैं……

जब वो अपनी भाषा नहीं छोड़ते तो हमें हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी को छोड़कर इंग्लिश में काम करने की क्या जरुरत है……

2. संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है

एक बार जब स्वामी विवेकानन्द जी विदेश गए… तो उनका भगवा वस्त्र और पगड़ी देख कर लोगों ने पूछा, – आपका बाकी सामान कहाँ है ?

स्वामी जी बोले…. ‘बस यही सामान है’….

तो कुछ लोगों ने व्यंगय किया कि… ‘अरे! यह कैसी संस्कृति है आपकी ? तन पर केवल एक भगवा चादर लपेट रखी है…….कोट – पतलून जैसा कुछ भी पहनावा नहीं है ?

इस पर स्वामी विवेकानंद जी मुस्कुराए और बोले, – ‘हमारी संस्कृति आपकी संस्कृति से भिन्न है…. आपकी संस्कृति का निर्माण आपके दर्जी करते हैं… जबकि हमारी संस्कृति का निर्माण हमारा चरित्र करता है.

– संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है.

3. सच्‍चा पुरुषार्थ

एक विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद के समीप आकर बोली: “ मैं आपसे शादी करना चाहती हूँ “

विवेकानंद बोले: ” क्यों?

मुझसे क्यों ?
क्या आप जानती नहीं की मैं एक सन्यासी हूँ?”

औरत बोली: “मैं आपके जैसा ही गौरवशाली, सुशील और तेजोमयी पुत्र चाहती हूँ और ये तब संभव होगा जब आप मुझसे शादी करेंगे”

विवेकानंद बोले: “हमारी शादी तो संभव नहीं है, परन्तु हाँ एक उपाय है”

औरत: क्या?

विवेकानंद बोले “आज से मैं ही आपका पुत्र बन जाता हूँ, आज से आप मेरी माँ बन जाओ…

आपको मेरे रूप में मेरे जैसा बेटा मिल जायेगा.

औरत विवेकानंद के चरणों में गिर गयी और बोली, आप साक्षात् ईश्वर के रूप है.

इसे कहते है पुरुष और ये होता है पुरुषार्थ…

एक सच्चा पुरुष सच्चा मर्द वो ही होता है जो हर नारी के प्रति अपने अन्दर मातृत्व की भावना उत्पन्न कर सके।

4. गंगा हमारी माँ है और उसका नीर, जल नहीं, अमृत है

एक बार स्वामी विवेकानन्द जी अमेरिका में एक सम्मलेन में भाग ले रहे थे. सम्मलेन के बाद कुछ पत्रकारों ने उन से भारत की नदियों के बारे में एक प्रश्न पूछा.

पत्रकार ने पूछा – स्वामी जी आप के देश में किस नदी का जल सबसे अच्छा है?

स्वामी जी का उत्तर था – यमुना का जल सभी नदियों के जल से अच्छा है.

पत्रकार ने फिर पूछा – स्वामी जी आप के देशवासी तो बोलते है कि गंगा का जल सब से अच्छा है.

स्वामी जी का उत्तर था – कौन कहता है गंगा नदी है, गंगा हमारी माँ है और उस का नीर जल नहीं है, – अमृत है.

यह सुन कर वहाँ बैठे सभी लोग स्तब्ध रह गये और सभी स्वामी जी के सामने निरुत्तर हो गये.

Thursday, 31 August 2017

राजीव गांधी के बारे में


आज हम बात करेगे एक ऐसे शख़्स की जो सबसे कम उम्र का प्रधानमंत्री बना लेकिन उतनी ही जल्दी मर भी गया. जिसने आज की जरूरतों को बहुत पहले समझ लिया था. जी, हम बात कर रहे है राजीव गांधी की. Let’s begin…

1. राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ. इनका नाम राजीव इसलिए रखा गया क्योकिं नेहरू की पत्नी का नाम था कमला. और राजीव का मतलब होता है कमल. कमला की यादें ताजी बनी रहे इसलिए नेहरू ने इनका नाम राजीव रखा।

2. बचपन में राजीव गांधी ने खेल-खेल में महात्मा गांधी के पैरों में फूल चढ़ा दिए तो महात्मा गांधी ने कहा बेटा ऐसा किसी की मृत्यु होने पर करते है. संयोग देखिए, अगले ही दिन गोली मारकर महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई।

3. राजीव गांधी हायर एजुकेशन के लिए लंदन गए. यहाँ उन्होनें एक के बाद एक दो काॅलेज में एडमिशन लिया. लेकिन दोनों जगह किसी न किसी कारण से पढ़ाई पूरी न कर सके।

4. लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए राजीव की मुलाकात एक लड़की से हुई जो इटली की रहने वाली थी और नाम था एडविग एन्टोनिया एल्बीना माइनो. यही वो लड़की है जो शादी के बाद सोनिया गांधी बनकर भारत आई. भारत आने के बाद सोनिया गांधी दिल्ली में अमिताभ बच्चन के घर रही थी।

5. सोनिया गांधी कैम्ब्रिज़ यूनिवर्सिटी में पढ़ती जरूर थी लेकिन पैसों के लिए एक रेस्टोरेंट में वेटर का काम भी करती थी।

6. राजीव गांधी पेशे से पायलट थे उन्होनें एयर इंडिया में नौकरी भी की. लेकिन बाद में दबाव बनाने के बाद राजनीति में आए. ये दबाव माँ इंदिरा ने 1980 में संजय गांधी की मौत के बाद बनाया था।

7. माँ इंदिरा की मौत के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकसभा की सबसे बड़ी जीत हासिल की थी. 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने 533 में से 404 सीट हासिल की। इसी जीत के साथ राजीव गांधी भारत के 7th प्रधानमंत्री बन गए।

8. राजीव गाँधी को टेक्नोलाॅजी से बहुत प्यार था. इनके कार्यकाल के दौरान ही MTNL का गठन हुआ था।

9. 21 मई 1991, रात 10 बजकर 15 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में लिट्टे के मानव बम ने राजीव गाँधी को मार दिया।

10. राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन दोनों खास़ दोस्त थे. राजीव की मृत्यु के दिन अमिताभ बच्चन और राहुल गाँधी अमेरिका में थे. दोनों एक ही प्लेन से भारत आए थे।

11. राजीव गाँधी की मौत की फुल तैयारी हुई थी जैसे परेड की रिहर्सल होती है ना, वैसे ही लिट्टे की धनु ने भी 12 मई 1991 को रैली को संबोधित करने आए पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल के नेता वी.पी. सिँह के पैर छुए थे. ठीक उसी तरह जैसे 9 दिन बाद राजीव गाँधी के छुए थे. ये सब रिहर्सल के तौर पर किया गया था. फर्क बस इतना था कि कुर्ते के नीचे बम नही था।

12. Q. लिट्टे की राजीव गाँधी से क्या दुश्मनी थी ?
Ans. श्रीलंका में गृहयुद्ध चल रहा था तो राजीव गाँधी ने श्रीलंका के राष्ट्रपति जे आर जयवर्धने के साथ एक समझौता किया था यानि एक जुबान दी थी. अपने कहे अनुसार, राजीव गांधी ने युद्ध रोकने के लिए भारतीय सेना को श्रीलंका में तैनात कर दिया. लेकिन इस समझौते के बीच में एक अड़चन बनी हुई थी जिसका नाम था लिट्टे. लिट्टे नही चाहता था कि भारत की शांति सेना को श्रीलंका भेजा जाए. शांति सेना भेजे जाने से पहले लिट्टे प्रमुख वी प्रभाकरन दिल्ली में राजीव गांधी से मिलने आया था. राजीव उसके साथ सख्ती से पेश आए. प्रभाकरन ने तमिल हितों की खातिर राजीव की बात मानने से इंकार कर दिया तो राजीव ने प्रभाकरन को 5 स्टार होटल अशोका में बात मानने तक नज़रबंद करा दिया. प्रभाकरन ने भी मन मारकर झूठ-मूठ की हाँ भर दी. जब प्रभाकरन सारी बातें मान गया तो उसे श्रीलंका जाने की इजाजत दी गई. इस घटना के बाद प्रभाकरन राजीव का जानी दुशमन बन गया और अब तो बस राजीव को मारने के मौके का इंतजार करने लगा।

13. जब वी प्रभाकरन राजीव से मिलने दिल्ली आए थे तो चलते समय राजीव गांधी ने उन्हें एक पर्सनल गिफ्ट दिया था, अपनी बुलेट प्रूफ जैकेट।

14. Q. राजीव गांधी ने लिट्टे को सपोर्ट क्यों नही किया ?
Ans. ट्रेनिंग लेने के लिए 5 संगठन भारत आए थे PLOTE, TELO, EPRLF, EROS, LTTE. ये सभी संगठन वो काम करते थे जो भारत कहता था लेकिन कुछ दिनों बाद LTTE ने भारत की बातें मानने से मना कर दिया. लिट्टे अपने सैनिकों के साथ वापिस श्रीलंका चला गया. अब लिट्टे से लड़ने के लिए भारत ने IPKF जवान श्रीलंका भेजे लेकिन कुछ सफलता नही मिली और लिट्टे के कारण भारत ने अपने 1200 IPKF जवान खो दिए. यही दो प्रमुख वजह थी।

15. पाठको, राजीव गाँधी की मौत की पूरी कहानी सुनो..

Ans. चुनाव का प्रचार जोर-शोर से हो रहा था. 21 मई 1991 को राजीव गांधी एक रैली को संबोधित करने के लिए चेन्नई से 30 किलोमीटर दूर श्रीपेरंबुदूर में पहुंचे. हाथों में माला लिए हजारों लोग खड़े थे. इन्हीं में एक लिट्टे की सुसाइड हमलों के लिए बनी काली बाघिन विंग की मेंबर धनु भी थी. सलवार सूट पहने नजर के चश्में लगाएँ, ये लड़की अपने देश की नही थी बल्कि श्रीलंका की थी. स्टेज के सामने डी शेप का घेरा बना हुआ था जहाँ सिर्फ VIP को आने की इजाजत थी. हाथ में चंदन की माला लिए धनु आगे बढ़ती है तो तमिलनाडु की सब इंस्पेकटर अनसुइया (जिसकी ड्यूटी रैली ग्राउंड में लगी हुई थी) धनु को हाथ पकड़कर आगे बढ़ने से रोकती है. धनु पलटने ही वाली थी कि राजीव गांधी की आवाज आती है कि सबको आने दो. फिर आगे बढ़कर धनु जैसे ही राजीव गांधी के पैर छूती है तो इसी के साथ बम फट जाता है और राजीव गांधी समेत 17 लोगो की मौत हो जाती है. यही थीं राजीव गाँधी की मौत की असली कहानी…

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