Sunday, 19 May 2019

भारतीय नौसेना ने MRSAM मिसाइल का सफल परीक्षण किया

भारतीय नौसेना ने MRSAM मिसाइल का सफल परीक्षण किया

भारतीय नौसेना के पोत ‘कोच्चि ’और ‘चेन्‍नई ’ ने पश्चिमी समुद्र तट पर यह परीक्षण किया गया. यह मिसाइल 70 किमी तक वार कर सकती है.

भारतीय नौसेना द्वारा 17 मई 2019 को मध्‍यम दूरी की जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल (MRSAM) का सफल परीक्षण किया गया है. रक्षा मंत्रालय द्वारा हाल ही में यह जानकारी सार्वजनिक की गई है. एमआरएसएएम के सफल परीक्षण से भारतीय नौसेना की युद्ध प्रतिरोधक क्षमता में महत्‍वपूर्ण बढ़ोतरी होगी.

भारतीय नौसेना के पोत ‘कोच्चि ’और ‘चेन्‍नई ’ ने पश्चिमी समुद्र तट पर यह परीक्षण किया गया. इस मिसाइल का परीक्षण भारतीय नौसेना, डीआरडीओ और इजरायल एयरोस्‍पेस इंडस्‍ट्रीज के द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है.

परीक्षण

•   भारतीय नौसेना द्वारा किये गये परीक्षण के दौरान दो वॉर शिप की मिसाइलों को एक शिप से ऑपरेट किया गया.

•   इन्हें अलग-अलग टारगेट पर साधा गया जिनकी रेंज भी अलग-अलग रखी गई थी.

•   परीक्षण में पाया गया कि यह मिसाइल लड़ाकू विमान को भी नष्ट कर सकती हैं तथा सटीक वार करने में सक्षम हैं.

•   वर्तमान में इन मिसाइलों की सुविधा केवल चीन, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस के पास की है.

प्रमुख बिंदु

•   डीआरडीओ ने इज़रायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज के साथ मिलकर इस मिसाइल का विकास किया है. भारत डायनामिक्स लिमिटेड ने एमआरएसएएम का निर्माण किया है.

•   भारत डायनामिक्स लिमिटेड ने एमआरएसएएम के निर्माण एवं विकास में मुख्य भूमिका निभाई है.

•   भविष्य में इस मिसाइल को भारत के सभी समुद्री युद्धपोतों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

•   मध्यम दूरी तक मार कर सकने वाली यह मिसाइलें 70 किलोमीटर की दूरी तक निशाना साध सकती हैं.

Saturday, 18 May 2019

विश्व के महत्वपूर्ण रेगिस्तान

विश्व के महत्वपूर्ण रेगिस्तान


रेगिस्‍तान: रेगिस्‍तान वह उजाड़ क्षेत्र होता है जहाँ वर्षा बहुत कम होती है और जिसके परिणामस्‍वरूप पौधों और प्राणियों के लिये जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ पायी जाती हैं।


1. महाद्वीप: अंटार्कटिका


रेगिस्तान का नाम: अंटार्कटिक


2. महाद्वीप: एशिया, यूरोप, उत्तरी अमेरिका:


रेगिस्तान का नाम: आर्कटिक रेगिस्तान


3. महाद्वीप: एशिया


रेगिस्तान का नाम: काराकुम, थार रेगिस्तान, किजिलकुम, तक्लामाकन,अरब, दश्त-ए काविर, दश्त-ए लत, गोबी रेगिस्तान 


4. महाद्वीप: अफ्रीका


रेगिस्तान का नाम: कालाहारी, नाम्बि, सहारा,


5. महाद्वीप: ऑस्ट्रेलिया


रेगिस्तान का नाम: गिब्सन, ग्रेट सैंडी, ग्रेट विक्टोरिया, सिम्पसन, तनामी


6. महाद्वीप: यूरोप


रेगिस्तान का नाम: ताबैर्नस रेगिस्तान


7. महाद्वीप: उत्तरी अमेरिका


रेगिस्तान का नाम: ग्रेट बेसिन, मोजावे, सेानोरान


8. महाद्वीप: दक्षिण अमेरिका


रेगिस्तान का नाम: अटाकामा, पेंटागोनियन


विश्‍व के प्रमुख रेगिस्‍तानों के बारे में याद करने योग्‍य महत्‍वपूर्ण बिन्‍दु


रेगिस्तान का नाम: अंटार्कटिक


दुनिया में सबसे बड़ा रेगिस्तान


दुनिया में सबसे बड़ा ठंडा रेगिस्तान


क्षेत्रफल 1,38,29,430 वर्ग किमी


प्रकार: ध्रुवीय


रेगिस्तान का नाम: आर्कटिक रेगिस्तान


दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा रेगिस्तान


क्षेत्रफल: 1,37,26,937 वर्ग किमी


प्रकार: ध्रुवीय


रेगिस्तान का नाम: गोबी


एशिया में स्थित है


क्षेत्रफल: 1,300,000 वर्ग किमी


सर्दियों वाला रेगिस्तान


रेगिस्तान का नाम: सहारा


सबसे बड़ा गर्म रेगिस्तान


अफ्रीका में स्थित है


उपोष्णकटिबंधीय मरूस्‍थल


क्षेत्रफल: 94,00,000 वर्ग किमी


रेगिस्तान का नाम: अटाकामा


पृथ्वी पर सबसे शुष्क रेगिस्तान


क्षेत्रफल: 1,40,000 वर्ग किमी


चिली में स्थित है


प्रकार: तटीय ठंडा


रेगिस्तान का नाम: ग्रेट बेसिन


प्रकार: शीतकालीन


अमेरिका में स्थित है


क्षेत्रफल: 4,92,000 वर्ग किमी


रेलवे, एसएससी एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जा सकने वाले प्रश्‍नों के प्रकार:


दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान कौन है: अंटार्कटिका रेगिस्तान


दुनिया में सबसे बड़ा ठंडा रेगिस्तान कौन है: अंटार्कटिका रेगिस्तान


दुनिया का सबसे बड़ा गर्म रेगिस्तान कौन है: सहारा रेगिस्तान


भारत का सबसे बड़ा मरुस्थल कौन है: थार रेगिस्तान


दुनिया के सबसे बड़ा शुष्क रेगिस्तान कौन सा है: अटाकामा रेगिस्तान (दक्षिण अमेरिका के चिली में स्थित)


दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेगिस्तान कौन है: आर्कटिक रेगिस्तान


अक्‍लामाकन रेगिस्तान कहां है: चीन

सौर मंडल के महत्वपूर्ण तथ्य

सौर मंडल के महत्वपूर्ण तथ्य


सौर मंडल सूर्य का एक मंडल है, जिसमें 8 ग्रह, बौना ग्रह, क्षुद्रग्रह, उल्का, एवं धूमकेतु शामिल हैं जो सूर्य के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के अंतर्गत आते हैं।


उद्गम


ब्रह्मांड एवं सौर मंडल के विकास के 3 से 4 प्रमुख सिद्धांत हैं। इन सभी सिद्धांतों में सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत बिग बैंग थ्योरी है।


जॉर्ज लेमैत्रे (Georges Lemaitre) द्वारा प्रस्‍तावित इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्मांड का विकास एक सूक्ष्म विलक्षणता से हुआ है और फिर यह अगले 8 बिलियन वर्षों तक विस्तृत होता है और इसका विस्‍तार अभी भी हो रहा है।


इससे कई अरब आकाशगंगाओं, सौर मंडलों, तारों इत्यादि का निर्माण हुआ है।


हमारा सौर मंडल एक सर्पिल आकार की आकाशगंगा में है जिसे मिल्की वे (Milky Way)कहा जाता है। हमारी सबसे निकटतम आकाशगंगा एंड्रोमेडा (Andromeda) है।


सामान्यतः प्रत्येक आकाशगंगा के केंद्र में एक ब्‍लैक होल होता है। मिल्की वे के केंद्र में सेगिटेरियस ए (Sagittarius A) नामक ब्‍लैक होल है।


सौर मंडल


हमारे सौर मंडल में, 8 ग्रह एवं कई अन्य खगोलीय पिण्ड अण्‍डाकार कक्षाओं में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं।


प्‍लूटो नामक बौने ग्रह (dwarf planet) को 2006 में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ द्वारा ग्रहों की सूची से हटा दिया गया था।


सूर्य, सौर मंडल का ऊर्जा स्‍त्रोत है/ यह सौर मंडल में ऊर्जा का एकमात्र स्त्रोत है।


बुध ग्रह सूर्य के सबसे निकट है जबकि वरूण ग्रह सूर्य से सबसे अधिक दूर है।


मंगल एवं बृहस्पति के बीच एक क्षुद्रग्रह पट्टी (asteroid belt) है। पट्टी के अन्दर के ग्रह, बाहर वाले ग्रहों से आकार, द्रव्यमान एवं रचना इत्यादि के संदर्भ में स्‍पष्‍ट रूप से भिन्‍न हैं।


पट्टी (belt) के अन्दर वाले ग्रहों को स्‍थलीय ग्रह (Terrestrial planets) कहा जाता है और वे ग्रह बुध, शुक्र, पृथ्वी एवं मंगल हैं। सीमा के बाहर वाले ग्रहों को जोवियन ग्रह (Jovian planets) कहा जाता है और वे ग्रह बृहस्पति, शनि, अरुण (यूरेनस) एवं वरुण (neptune) हैं।


स्थलीय ग्रह महीन वातावरण के साथ धातु खनिजों एवं चट्टानी परतों सहित सूर्य के निकट होते हैं तथा इनमें प्राक्रतिक उपग्रहों की संख्‍या कम होती है।  जबकि जोवियन ग्रह सूर्य से दूर होते हैं तथा गैसीय होते हैं, इनके चारों ओर वलय (rings) होते हैं और इनमें प्राकृतिक उपग्रहों की संख्‍या अधिक होती है।


सूर्य एवं ग्रहों के संदर्भ में तथ्य


1. सूर्य


हमारे सौर मंडल में एकमात्र तारा और सौर मंडल का ऊर्जा स्‍त्रोत है


हाइड्रोजन (73%) एवं हीलियम (25%) गैसों तथा अन्य धातुओं से निर्मित है। सूर्य में हमारे सौर मंडल का लगभग 99% द्रव्यमान है।


यह पृथ्वी से लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित है। इसका प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में 3 लाख कि.मी/सैकंड की गति से लगभग 8 मिनट 30 सैकंड का समय लेता है।


सतह का तापमान = 5800 K या 5600 डिग्री सेल्सियस


केंद्र का तापमान = 15.7 मिलियन K


2. बुध ग्रह


यह सूर्य से सबसे निकटतम तथा अत्यधिक गर्म ग्रह है।


यह 4900 कि.मी. के व्यास के साथ सौर मंडल का सबसे छोटा ग्रह है।|


यह 172500 कि.मी. प्रति घंटा की गति से 88 दिनों में सूर्य के चारों ओर घूर्णन को पूर्ण करने वाला सबसे तेज ग्रह है।


इस ग्रह पर जल एवं नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन एवं कार्बन-डाई-ऑक्साइड जैसी गैंसे उपस्थित नहीं हैं।


3. शुक्र


सौर मंडल का सबसे गर्म ग्रह जिसका सतही तापमान 478 डिग्री सेल्सियस होता है।


इसे पृथ्‍वी के जुड़वा ग्रह (“Earth’s Twin”) के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा शुक्र तथा पृथ्वी के बीच आकार तथा द्रव्यमान में समानता के कारण है।


सौर मंडल के दो ग्रहों में से एक ग्रह ऐसा होता है जो अक्ष के चारों ओर दक्षिणावर्त दिशा में घूर्णन करता है।


सौर मंडल का सबसे चमकदार तारा है। इसे सुबह एवं शाम को खुली आँखों से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसलिए इसे “सांझ का तारा (इवनिंग स्टार)” एवं “भोर का तारा (मोर्निंग स्टार)” भी कहा जाता है।


4. पृथ्वी


एक अच्‍छे वातावरण के साथ जीवन को समर्थन देने वाला एकमात्र ग्रह है।


इस पर जल की उपलब्धता के कारण इसे “नीला ग्रह (ब्लू प्‍लेनट)” भी कहा जाता है।


इसका एक प्राकृतिक उपग्रह “चन्‍द्रमा” है।


5. मंगल


इसे लौह-युक्त लाल मृदा के कारण लाल ग्रह” भी कहा जाता है।


यह बुध के बाद सौर मंडल का दूसरा सबसे छोटा ग्रह है।


इसमें दो प्राक्रतिक चंद्रमा “फोबोस” एवं डीमोस” हैं।


इसमें घाटियों, गड्ढ़ों, रेगिस्‍तानों तथा आईस कैप इत्‍यादि के साथ महीन वातावरण और सतह शामिल है।


“ओलम्‍पस मोन्‍स” – मंगल ग्रह पर सौर मंडल में सबसे बड़ा ज्वालामुखी तथा सबसे बड़ा पर्वत है।


6. बृहस्पति


यह सबसे कम घूर्णन अवधि वाला सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह है।


इसके वातावरण में हाइड्रोजन, हीलियम एवं अन्य गैसें उपस्थित होती हैं।


यह चन्द्रमा एवं शुक्र के बाद रात्रि आकाश में तीसरा सबसे अधिक चमकदार ग्रह है।


सौर मंडल में इस ग्रह पर एक विशाल तूफ़ान ग्रेट रेड स्‍पॉट होता है।


इसमें 4 विशाल गेलिनियन चंद्रमाओं आई.ओयूरोपागेनीमेड एवं केलिस्‍टो सहित कम से कम 69 चंद्रमा होते हैं, जिनकी खोज गेलिलियो द्वारा की गई थी। इन सब में गेनीमेड़” सबसे बड़ा है।


इसके चारों ओर एक अस्पष्ट वलय (ring)  होता है।


7. शनि ग्रह


सौर मंडल में दूसरा सबसे बड़ा ग्रह एवं एक विशालकाय गैसीय पिंड|


इसके चारों ओर चमकदार एवं संकेन्द्रीय वलय होते हैं जो छोटी चट्टानों एवं बर्फ के टुकड़ों के बने होते हैं।


ग्रह जल पर तैर सकता है क्योंकि इसका घनत्व जल से कम होता है।


इसके निम्नतम 62 चंद्रमा हैं तथा उनमें सबसे बड़ा टाइटन (Titan) है।


8. अरुण ग्रह (यूरेनस)


इसका सौर मंडल में तीसरी सबसे बड़ी ग्रह त्रिज्या एवं चौथा सबसे बड़ा ग्रह द्रव्यमान है।


यह हरे रंग का होता है।


इसकी खोज विलियम हेर्स्चेल ने 1781 में की थी।


इसे विशाल हिमखंड (Ice Giant) के नाम से भी जाना जाता है। अरूण ग्रह (यूरेनस) का वातावरण प्राथमिक रूप से हाइड्रोजन एवं हीलियम से मिलकर बना है, किन्तु इसमें अधिक जल, अमोनिया इत्यादि भी हैं।


सौर मंडल में इस ग्रह का वातावरण सबसे ठंडा/शीतल है।


यह शुक्र (वीनस) के समान किन्तु अन्य ग्रहों के विपरीत, अपने अक्ष पर दक्षिणावर्त घूर्णन करता है।


इसके निम्नतम 25 चंद्रमा हैं। लोकप्रिय चंद्रमा – मिरांडा, एरियल एवं अमब्रिल इत्यादि हैं।


9. वरूण ग्रह (Neptune)


यह ग्रह सूर्य से अधिकतम दूरी पर स्थित है।


इसे भी “विशाल हिमखंड (Ice Giant)” कहते हैं। इसका वातावरण में प्राथमिक रूप से हाइड्रोजन एवं हीलियम का संयोजन है।


मीथेन के कारण इसका रंग हल्का नीला होता है।


यह सौर मंडल में चौथा सबसे बड़ा ग्रह एवं तीसरा सबसे अधिक द्रव्यमान वाला ग्रह है।


इसकी खोज जॉन गेल एवं उर्बेन ले वेरर द्वारा 1846 में की गई थी। यह ऐसा एकमात्र ग्रह है जिसकी खोज गणितीय पूर्वानुमान के द्वारा की गई है।


इसमें 14 उपग्रह हैं। प्रसिद्ध चंद्रमा – ट्राईटन (Triton) है।


10. प्लूटो


अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (आई.ए.यू) द्वारा निर्धारित की गई ग्रहों की नईं परिभाषा के अनुसार, प्लूटो को 2006 में ग्रहों की सूची से हटा दिया गया है।


प्लूटो को अब एक बौना ग्रह माना जाता है (जिसका आकार ग्रहों एवं क्षुद्रग्रहों के बीच है) एवं यह कुईपर पट्टी का एक सदस्य है।


कुइपर पट्टी वरुण ग्रह के कक्ष के बाहर एक अण्‍डाकार सीमा है जिसमें क्षुद्रग्रह, चट्टानें एवं धुमकेतू निहित हैं।


अन्य अन्तरिक्ष वस्तुएं


1. क्षुद्रग्रह


ये छोटी वस्तुएं होती हैं; चट्टानें (ज्यादातर अवशेष) सूर्य के चारों ओर घूर्णन करते रहते हैं।


ये मुख्यतः क्षुद्रग्रह पट्टी में पाए जाते हैं जो मंगल एवं बृहस्पति के कक्षों के बीच में स्थित होते हैं।


इन्हें छोटे ग्रह भी कहा जाता है।


सेरेसवेस्‍टासाइक सौर मंडल में कुछ प्रसिद्ध एवं सबसे बड़े क्षुद्रग्रह हैं।


2. उल्का एवं उल्कापिंड


इन्हें उल्‍का (शूटिंग स्‍टार) भी कहा जाता है।


उल्काएं छोटे आकार की चट्टानी सामग्री होती है जो सामान्यतः क्षुद्रग्रह के टकराव से बनती है एवं पृथ्वी पर पहुँचती है।


पृथ्वी की वायुमंडलीय परतों के कारण, ये छोटी चट्टानें सतह तक पहुंचने से पहले जल जाती हैं।


लेकिन कुछ ऐसी उल्काएं भी हैं जो पूर्ण रूप से नहीं जलती हैं और पृथ्वी की सतह तक पहुँच जाती हैं। उन्हें उल्कापिंड कहा जाता है।


विलियामेटमबोजीकेप यॉर्क एवं एल चाको (Willamette, Mbozi, Cape York, एवं El Chaco)पृथ्वी पर पाए जाने वाले कुछ उल्कापिंड हैं।


यह माना जाता है कि भारत में लोणार झीलमहाराष्ट्र प्लीस्टोसीन युग में एक उल्का प्रभाव के कारण ही निर्मित हुई है।


3. धूमकेतु


ये चमकदार, प्रकाशमान “पुच्छल तारे (Tailed Stars)” होते हैं। ये चट्टानी एवं धात्विक सामग्री  होती है जो जमी हुई गैसों (frozen gases) से घिरी होती है।


ये सामान्यतः कुइपर सीमा (Kuiper Belt) में पाए जाते हैं। ये सूर्य की ओर यात्रा करते हैं।


इनका अंतिम भाग (पूंछ) सूर्य के विपरीत होता है एवं अगला भाग सूर्य की ओर होता है।


जब वे सूर्य के नजदीक यात्रा करते हैं तब वे साफ़ दिखाई देते हैं।


हैली धूमकेतु प्रसिद्ध है जो आखिरी बार वर्ष 1986 में प्रकट हुआ था और यह प्रत्येक 76 वर्षों में पुन: प्रकट होता है।

वायुमंडल एवं उसकी परतें पर भूगोल नोट्स

वायुमंडल एवं उसकी परतें पर भूगोल नोट्स


वायुमंडल गैसों की एक पर्त है जो गृह अथवा पर्याप्त द्रव्यमान के किसी पदार्थ निकाय को अपने गुरुत्व भार से चारों तरफ घेरे रखती है। आइए हम इस विषय को गहराई से समझते हैं क्योंकि आगामी रेलवे और एस.एस.सी. परीक्षाओं 2018 के लिए यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है।


वायुमंडल


पृथ्वी को चारों ओर से घेरने वाली वायु के जाल को वायुमंडल कहते हैं।


वायुमंडल का विस्तार पृथ्वी सतह से 1000 कि.मी. की ऊंचाई तक है। परंतु वायुमंडल का कुल 99% द्रव्यमान मात्र 32 कि.मी. के अंदर ही पाया जाता है।


इसी कारण से वायुमंडल पृथ्वी के आकर्षण बल से बंधा रहता है।


वायुमंडल का संघटन


नाइट्रोजन – 78%


ऑक्सीजन – 21%


आर्गन – 0.93%


कार्बन डाइऑक्साइड – 0.03%


नियॉन – 0.0018%


हीलियम – 0.0005%


ओजोन – 0.0006%


हाइड्रोजन – 0.00005%


वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड कम मात्रा में पाई जाती है


यह वायु का एक महत्वपूर्ण घटक है क्योंकि इसमें ऊष्मा को अवशोषित करने की क्षमता होती है। अतः यह वायुमंडल को गर्म रखता है, और पृथ्वी की ऊष्मा का संतुलन बनाए रखता है।


धूल के कण सूर्यताप को रोकते और परावर्तित करते हैं


वायु में उपस्थित प्रदूषित कण न केवल अधिक मात्रा में सूर्यताप अवशोषित करते हैं बल्कि स्थलीय विकिरण की अधिक मात्रा को भी अवशोषित करते हैं।


वायुमंडल में उपस्थित धूल के कणों के कारण ही हमें सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य लाल और नारंगी रंग का दिखाई पड़ता है।


वायुमंडल की पर्तें


वायुमंडल की पांच मुख्य पर्तें निम्नलिखित हैं –


क्षोभ मंडल


समताप मंडल


मध्य मंडल


तापमंडल


बाह्य मंडल 


वायुमंडल की पर्तों का विस्तृत वर्णन-


1. क्षोभमंडल


यह वायुमंडल की पहली पर्त है। विषुवत रेखा पर इसका विस्तार 18 कि.मी. और ध्रुवों पर इसका विस्तार 8 कि.मी. है।


इस पर्त में ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में गिरावट आती है। इसका कारण यह है कि ऊंचाई बढ़ने के साथ वायु का घनत्व घटता जाता है और इसलिए ऊष्मा कम अवशोषित होती है। इसमें वायुमंडल की 90से अधिक गैसें मौजूद होती हैं।


चूंकि इस पर्त में अधिकांश जल वाष्प के बादल बनने के कारण, सभी वायुमंडलीय परिवर्तन क्षोभमंडल [(Troposhpere); Tropo = परिवर्तन)] में होते हैं।


वह ऊंचाई जहां पर तापमान का घटना बंद हो जाता है, ट्रोपोपॉज़ कहते हैं। यहां तापमान -58 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है। 


2. समताप मंडल


यह वायुमंडल की दूसरी पर्त है। इसका विस्तार क्षोभसीमा से 50 कि.मी. ऊंचाई तक है।


इस पर्त में मौजूद ओजोन द्वारा सूर्य की पराबैंगनी किरणों के अवशोषण से तापमान बढ़ता है। तापमान धीरे-धीरे बढ़कर 4 डिग्री सेल्सियस हो जाता है।


यह पर्त बादलों और उससे जुड़े मौसमी प्रभावों से मुक्त होती है। इसलिए यह बड़े जेट प्लेन के लिए आदर्श उड़ान स्थिति प्रदान करती है। 


3. मध्य मंडल


समताप मंडल के ऊपर मध्य मंडल है।


मध्य मंडल का विस्तार 80 कि.मी. तक है।


यहां तापमान फिर से गिरता है और गिरकर -90 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है।


इस पर्त के छोर को मध्यसीमा कहते हैं।


 4. तापमंडल


इस पर्त का विस्तार 640 कि.मी. तक है।


इस पर्त में तापमान वृद्धि का कारण यहाँ उपस्थित गैस के अणु हैं जो सूर्य की X-किरणों और पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करते है।


तापमंडल के विद्युत आवेशित गैस के अणु पृथ्वी से रेडियो तरंगों को अंतरिक्ष में भेजते हैं। इस प्रकार, यह पर्त लंबी दूरी के संवाद में सहायता करते हैं।


तापमंडल हमारी उल्का पिंडों और निर्जन उपग्रहों के पृथ्वी से टकराने से भी रक्षा करता है क्योंकि इसका उच्च तापनाम पृथ्वी सतह पर आने वाले सभी प्रकार के मलवों को जला देता है।


 5. बाह्य मंडल


बाह्य मंडल का विस्तार ताप मंडल से 960 कि.मी. तक होता है।


यह धीरे-धीरे अंतग्रहीय अंतरिक्ष में घुल जाता है।


इस पर्त में तापमान 300 डिग्री से लेकर 1650 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है।


इस पर्त में केवल ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, आर्गन और हीलियम होती है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण के अभाव में गैस के अणु आसानी से अंतरिक्ष में उड़ जाते हैं।


नदी एवं ग्‍लेशियर तंत्र द्वारा निर्मित स्‍थल प्रतिरूप पर नोट्स

नदी एवं ग्‍लेशियर तंत्र द्वारा निर्मित स्‍थल प्रतिरूप पर नोट्स


नदी तंत्र द्वारा निर्मित स्‍थल प्रतिरूप:


पैथोल:


पैथोल नदी के तल में विभिन्‍न गहराई और कुछ सेण्‍टीमीटर से कई मीटर तक व्‍यास के बेलनाकार छेद होते है।


इनका निर्माण नदी के ऊपरी पृष्‍ठ पर नदी की धारा के घूर्णन प्रभाव के कारण होता है।


ये धारायें नदी के तल में अपरदन करती हुई उसमें छोटी अवनतियों का निर्माण करती है।


ऐसे पैथोल महराष्‍ट्र के कुकड़ी, कृष्‍णा और गोदावरी नदी के तल में पाये जाते हैं।


V आकार की घाटी:


इस प्रकार की घाटियाँ पर्वतीय क्षेत्रों में पासी जाती है।


V आकार की घाटी नदी के ऊपरी भागों में पायी जाती हैं जो कि अपरदन और अपक्षय दोनों के परिणामस्‍वरूप निर्मित होती है।


V आकार की घाटी गहरी नदी घाटियाँ होती हैं जिनके किनारे खड़े और V आकार के नजर आते हैं।


खड़े किनारों वाली गहरी व संकरी घाटी को जार्ज कहते हैं।


महाराष्‍ट्र के थाणे जिले में उलहास नदी में कई जार्ज पाये जाते हैं और मध्‍यप्रदेश में जबलपुर के निकट बेड़ाघाट में नर्मदा नदी के जार्ज विख्‍यात हैं।


झरने (भौगोलिक निर्मित)


झरनों का निर्माण कठोर व कोमल दोनों चट्टानों के अपरदन से होता है।


जब नदी प्रतिरोधी चट्टान के ऊपर बहती है, तो यह कम प्रतिरोधी चट्टान के ऊपर गिरती है, और उसका अपरदन कर दोनों प्रकार की चट्टानों के बीच अधिक काफी गहराई पैदा कर झरने का निर्माण करती है।


हजारों वर्षों तक, कैप चट्टान के निरंतर दबने और झरने के लगातार गिरने से अपरदनात्‍मक जॉर्ज का निर्माण होता है।


नियाग्रा नदी पर नियाग्रा प्रपात और कनार्टक में शरावती नदी पर जोग प्रपात प्रमुख झरने हैं।


मेंडर्स और ऑक्‍स-बो झील:


मेंडर्स नदी में वे बल (मोड़) हैं जब नदी सर्पिलाकार मार्ग पर आगे बढ़ती है।


यह नदी का सर्पिलाकार से नदी के सीधे मार्ग से मुड़ जाने की माप होती है।


मेंडर्स का निर्माण नदी के क्षैतिज अपरदन के कारण होता है और जैसे जैसे अपरदन समय के साथ बढ़ता है, तो नदी में मेंडर्स पुन: सीधी रेखा में प्रवाहित होने लगते हैं।


ऑक्‍स-बो झील मेंडर्स का ही परिणाम हैं जो कि अत्‍यधिक निक्षेपण व अपरदन से होकर गुजरते हैं।


जब मेंडर्स अपने मुख्‍य मार्ग से कट जाते हैं और इस जगह में जल इकट्ठा हो जाता है तो यह ऑक्‍स बो झील के जैसा दिखता है।


फैन आकार के मैदान:


ये उस क्षेत्र में बनते हैं जहाँ सहायक नदियाँ मुख्‍य नदियों में मिल जाती हैं।


इनका निर्माण सहायक नदियों द्वारा बहाकर ले जाये जा रहे पदार्थ के निक्षेप से होता है।


ये निक्षेप फैन आकार के मैदान जैसे दिखते हैं।


बाढ़ के मैदान:


इनका निर्माण नदी के उसकी क्षमता के ऊपर बहने और उसके आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ के कारण होता है।


नदी द्वारा प्रवाहित गाद इन बाढ़ के क्षेत्रों में जमा हो जाती है और नदी के दोनों और समतल भूमि का निर्माण करते हैं।


गंगा का मैदान बाढ़ निर्मित मैदान है।


सेतूबंध:


सेतूबंध नदी की बाढ़ द्वारा निर्मित प्राकृतिक बांध हैं।


जब कभी नदी में बाढ़ आती है, तो घर्षण बढ़ने के कारण नदी की गति में बहुत कमी आ जाती है और इससे नदी अपना भार बाढ़ के मैदान पर उड़ेल देती है।


निरंतर बाढ़ के आने से टीलों का निर्माण होता है जो कि सेतूबंध में बदल जाते हैं।


डेल्‍टा:


डेल्‍टा शब्‍द का प्रयोग ग्रीक दार्शनिक हेरोडोटस (इतिहास के पिता) ने किया था। नील नदी के मुख का ग्रीक अक्षर डेल्‍टा के आकार के होने के कारण किया गया।


डेल्‍टा निक्षेपण मैदान है जो कि नदी के मुहाने पर पाये जाते हैं जहाँ जल समूह (झील अथवा समुद्र) की रफ्तार नदी की स्‍वयं की रफ्तार से कम होती है।


कालानुक्रम में यह निक्षेप भौगोलिक आकर के नदी डेल्‍टा का निर्माण करता है।


गंगा नदी का सुंदरबन डेल्‍टा विश्‍व में सबसे बड़ा डेल्‍टा है।


नदी क्रिया द्वारा निर्मित स्‍थलाकृति


अपरदनअपरदन-निक्षेपणनिक्षेपणV आकार की घाटीमेंडरफैन आकार के मैदानजार्जऑक्‍स-बोबाढ़ के मैदानपैथोल्‍सझीलडेल्‍टाजलप्रपात सेतूबंध

ग्‍लेशियर:


ग्‍लेशियर सघन बर्फ की स्‍थायी चट्टान होती है जो कि अपने भार के कारण नियत रूप से गिरती रहती है। इसका निर्माण वहाँ होता है जहाँ बर्फ अपने पृथक्‍करण की तुलना में कई वर्षों तक जमा होती रहती है।


औसतन एक दिन में ग्‍लेशियर 1 से 15 मीटर खिसकते हैं।


ग्‍लेशियर दो प्रकार के होते हैं: महाद्वीपीय ग्‍लेशियर और अल्‍पाइन या पर्वतीय ग्‍लेशियर आदि।


ग्‍लेशियरों द्वारा निर्मित स्‍थलाकृति:


क्रीक:


क्रीक (सर्क) पर्वत की ओर प्‍याला नुमा एक चट्टानी घाटी है। जो प्राय: ग्‍लेशियर अथवा स्‍थायी बर्फ से ढकी रहती है।


क्रीक का निर्माण ग्‍लेशियर द्वारा होता है, जिसमें पूर्व घाटी को गोल आकार और तीव्र किनारे में बदल देती है।


क्रीक के पीछे की दीवार ऊँची चट्टान होती है और ऊपरी पृष्‍ठ अवतल और आकार में बहुत बड़ा होता है। सम्‍पूर्ण आकृति हत्‍थे वाली कुर्सी जैसी लगती है।


जब ग्‍लेशियर पूरी तर‍ह से पिघल जाता है जो क्रीक में पानी जमा हो जाता है और एक झील का निर्माण होता है, जिसे टार्न कहते हैं।


U आकार घाटी:


जब कोई ग्‍लेशियर पर्वतीय क्षेत्र में घाटी में बहता है तो बर्फ के कारण घाटी के किनारों पर घर्षण के कारण घाटी के किनारे अपरदित हो जाते हैं।


जब किनारों पर घर्षण आधार के घर्षण से अधिक होता है, तो एक चौड़े आधार और खड़े किनारों वाली घाटी का निर्माण होता है। इसे ही U आकार की घाटी कहते हैं।


लटकती घाटी (हैंगिंग वैली):


लटकटी घाटियाँ प्राय: घाटी ग्‍लेशियरों से जुड़ी होती हैं जो कि मुख्‍य घाटी से अपने किनारों से जुड़ती है।


ये मुख्‍य घाटी और उसके किनारों के साथ प्रवेश करने वाली घाटी के मध्‍य अपरदन की विभिन्‍न दरों का परिणाम है।


सहायक नदियाँ मुख्‍य घाटी से काफी ऊपर रह जाती हैं, और किनारों पर लटकती रहती हैं, उनकी नदी अथवा धारा मुख्‍य घाटी में छोटे जलप्रपात अथवा अकेले बडे महाप्रपात द्वारा मुख्‍य घाटी में प्रवेश करती हैं।


फोर्ड:


यह तट के समीप जहाँ धारा का समुद्र में प्रवेश होता है, खड़ा संकरा प्रवेश मार्ग है।


फोर्ड तट नार्वे, ग्रीनलैण्‍ड और न्‍यूजीलैण्‍ड में पाये जाते हैं।


मोरेन:


ग्‍लेशियर द्वारा प्रवाहित एवं निक्षेपित सामग्री को मोरेन कहते हैं।


मोरेन चट्टानों के टुकड़े होते हैं जो कि तुषार के कारण टूट जाते हैं और नदी द्वारा बहा लिये जाते हैं।


कई उर्ध्‍वाधर ढालों वाली जिगजैग पहाड़ी का निर्माण रेत और बजरी के लम्‍बे भाग के कारण निर्मित होते हैं, ये एस्‍कर्स कहलाते हैं।


कम ऊँचाई की अण्‍डाकार पहाड़ी ड्रमलिन कहलाती हैं।


मोरेन के प्रकार:


लैटरल


मिडियल


टर्मिनल


ग्राउंड

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