Thursday, 19 December 2019

पृथ्वी की घूर्णन गति एवं परिक्रमा  ( Earth's Rotation Speed and Revolution )

पृथ्वी की घूर्णन गति एवं परिक्रमा  ( Earth's Rotation Speed and Revolution )


घूर्णन


- पृथ्वी एक कतिपय धुरी पर सदैव पश्चिम से पूर्व को घूमती रहती है। पृथ्वी की इसी गति को घूर्णन अथवा आवर्तन गति कहा जाता है। पृथ्वी अपनी गति पर जब एक पूरा चक्कर लगा लेती है तोएक दिन होता है। इसी से इस गति को दैनिक गति भी कहते हैं।


- पृथ्वी जिस धुरी अथवा अक्ष पर घूमती है, वह काल्पनिक रेखा है, जो पृथ्वी के केंद्र से होकर उसके उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों को मिलाती है। पृथ्वी का यह अक्ष अपने कक्ष के तल के साथ 66 डिग्री अंश का कों बनाता है। पृथ्वी का यह अक्ष सदैव एक ओर ही झुका रहता है।


- एक मध्यान्ह रेखा के ऊपर किसी निश्चितनक्षत्र के उत्तरोत्तर के बाद गुजरने के बीच की पृथ्वी का अक्ष  सदैव एक ही ओर झुका रहता है। एक नक्षत्र दिवस की लम्बाई 23 घंटे, 56 मिनट, और 4.09 सेकेण्ड होती है।


- एक दिन की अवधि की गणना जब किसी निश्चित मध्यान्ह रेखा के ऊपर मध्यान्ह सूर्य के उत्तरोतर दो बार गुजरने के बीच लगने वाले समय के आधार पर की जाती है, तो वह सौर दिवस कहलाता है। सौर दिवस की औसत लम्बाई  24 घंटे की होती है। सौर दिवस नक्षत्र दिवस से 3 मिनट और 56 सेकेण्ड अधिक बड़ा होता है।


- इनका द्रव्यमान इतना हो कि वे बाहरी ग्रहों के प्रभाव से बचने हेतु अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण लगभग गोल आकार के हों।


- वे अन्य ग्रहों की कक्षा का अतिक्रमण नहीं करते हैं। प्लूटो की कक्षा अन्य ग्रहों की तुलना में झुकी है तथा अरुण की कक्षा का अतिक्रमण करती है।


पृथ्वी और सौरमंडल से सम्बंधित कुछ परिभाषाएं


दैनिक गति- पृथ्वी द्वारा अपनी धुरी पर लगाया गया एक चक्कर जो एक दिन होता है।


- वार्षिक गति- पृथ्वी द्वारा अपनी कक्षा में सूर्य की ओर लगाया गया एक चक्कर जिसमे उसे 365¼ दिन लगते हैं।


नक्षत्र दिवस- एक मध्यान्ह रेखा के ऊपर किसी निश्चित रेखा के उत्तरोत्तर दो बार गुजरने के बीच की अवधि।


सौर दिवस- किसी  निश्चितमध्यान्ह रेखा के ऊपरमध्यान्ह सूर्य के उत्तरोत्तर दो बार गुजरने के बीच की अवधि।


उपसौर- पृथ्वी द्वारा अपनी अंडाकार कक्षा में सूर्य की परिक्रमा अवधि के क्रम में सूर्य से सबसे अधिक दूरी की स्थिति जो 4 जुलाई को होती है।


कर्क संक्रांति- पृथ्वी द्वारा सूर्य के क्रम में 22 दिसम्बर की स्थिति जब सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है।


विषुव- 21 मार्च और 23 सितम्बर की स्थितियां जब सूर्य भूमध्य रेखा पर लम्बवत चमकता है, जिसके कारण दोनों गोलार्द्धों में सर्वत्र दिन-रात बराबर होते हैं। 21 मार्च वाली स्थिति को बसंत विषुव और 23 सितम्बर वाली स्थिति को शरद विषुव की अवस्था कहा जाता है।


सिजगी- सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की एक रेखीय स्थिति।


- वियुति- सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा की स्थिति, जिसके कारण चन्द्र ग्रहण होता है।


- युति- सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा की स्थिति, जिसके कारण सूर्य ग्रहण होता है।


- पृथ्वी के घूर्णन के कारण पृथ्वी का प्रत्येक भाग बारी-बारी से सूर्य के सम्मुख आता रहता है, अतः सूर्य के सम्मुख वाले भाग में दिन और पीछे वाले भाग में रात्रि होती है, इस प्रकार दिन-रात का क्रम पृथ्वी की घूर्णन गति का परिणाम है।


- इस प्रकार पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण  24 घंटे की अवधि वाला दिन अस्तित्व में आता है।


- घूर्णन के अक्ष के अधर पर ही अक्षांश एवं देशांतर का निर्धारण किया जाता है।


- इस कारण पृथ्वी पर भौतिक और जैविक दोनों क्रिया प्रभावित होती है।


- कोरिऑलिस बल की उत्पत्ति होती है, जिसके कारण उत्तरी गोलार्द्ध में जल एवं पवनें अपनी दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बायीं ओर मुड़ जाते हैं।


- महासागरों में ज्वार-भाटा आता है।


परिक्रमा


- पृथ्वी किम परिक्रमा का मार्ग अंडाकार है। अतः पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी वर्ष भर एक सी नहीं रहती। जनवरी में यह सूर्य के सबसे निकट होती है। इस समय पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी ४७० लाख किमी. होती है। पृथ्वी की इस स्थिति को उपसौर कहते हैं। जुलाई में पृथ्वी सूर्य से अपेक्षाकृत अधिक दूर होती है। इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी 520 लाख किमी. रहती है। अतः पृथ्वी की यह स्थिति अपसौर कहलाती है। अपसौर की स्थिति 4 जुलाई को होती है। पृथ्वी की परिक्रमण गति के निम्न प्रभाव देखे जा सकते हैं-


1. सूर्य की किरणों का सीधा और तिरछा चमकना


2. वर्ष की अवधि का निर्धारण


3. कर्क और मकर रेखाओं का निर्धारण


4. ध्रुवों पर 6-6 माह के दिन और रात


5. धरातल पर ताप वितरण में भिन्नता


6. जलवायु कतिबंधों का निर्धारण


7. दिन-रात का छोटा बड़ा होना


ऋतु परिवर्तन


- भूमध्य रेखा पर ही सदैव दिन-रात बराबर होते हैं, क्योंकि भूमध्य रेखा को प्रकाश-वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बांटता है, परन्तु चूँकि पृथ्वी अपने अक्ष पर 23½° झुकी होती है और सदा एक ओर ही झुकी रहती है, इसलिए भूमध्य रेखा के अतिरिक्त उत्तरी व दक्षिणी गोलार्द्ध की सभी अक्षांश रेखाओं को प्रकाश वृत्त दो बराबर भागों में बांटकर भिन्न-भिन्न ऋतुओं में असमान रूप से विभक्त करता है। परिणामस्वरूप भूमध्यरेखा के अतिरिक्त शेष भागों में दिन-रात की अवधि समान नहीं होती है।


उपर्युक्त विवरण के अधर पर दिन रात के छोटे बड़े होने के संक्षेप में निम्न कारण है-


1. पृथ्वी की वार्षिक गति का होना।


2. पृथ्वी का अक्ष का तल सदा 66½° झुके होना।


3. पृथ्वी के अक्ष का सदा एक ही ओर झुके रहना।


4.पृथ्वी के परिक्रमण में 4 मुख्य अवस्थाएं आती हैं तथा इन चारों अवस्थाओं में ऋतु परिवर्तन होता है।


- पृथ्वी का अक्ष इसके कक्षा तल पर बने लम्ब से 23½° का कों बनाता है।


- जब सूर्य कर्क रेखा से लम्बवत चमकता है। इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की सबसे अधिक ऊंचाई होती है, जिससे यहाँ दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु होती है, यह स्थिति 21 जून को घटित है तथा इस स्थिति को कर्क संक्रांति या ग्रीष्म अयनांत कहते हैं।


- 22 दिसम्बर की स्थिति में दक्षिणी ध्रुव सूर्य के सम्मुख होता है और सूर्य मकर रेखा पर चमकता है, जिससे यहाँ ग्रीष्म ऋतु होती है। इस स्थिति को मकर संक्रांति या शीत अयनांत कहा जाता है। इस समय सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में तिरछा चमकता है, जिससे दिन छोटे व रातें बड़ी होती हैं और गर्मी कम होने से जाड़े की ऋतु होती है।


- 21 मार्च और 23 सितम्बर की स्थितियों में सूर्य भूमध्य रेखा पर चमकता है\ इस समय समस्त अक्षांश रेखाओं का आधा भाग प्रकाश में रहता है, जिससे सर्वत्र दिन रात बराबर होते हैं। दोनों गोलार्द्धों में दिन रात और ऋतु की समानता रहने से इन दोनों स्थितियों को विषुव अथवा समरात दिन कहा जाता है। 21 मार्च वाली वसंत स्थिति को शरद विषुव अवस्था कहा जाता है।


इस प्रकार ऋतु परिवर्तन के भिन्न कारण हैं-


1. पृथ्वी के अक्ष का झुकाव


2. पृथ्वी के अक्ष का सदैव एक ही ओर झुके रहना


3. पृथ्वी की परिक्रमण या वार्षिक गति होना


4. इन तीनों के परिणामस्वरूप दिन-रात का छोटा बड़ा होते रहना


चन्द्र कलाएं


- बढ़ता हुआ चाँद- शुक्लपक्ष


- घटता हुआ चाँद- कृष्णपक्ष


- सूर्य, चन्द्रमा एवं पृथ्वी की एक रेखीय स्थिति सिजगी कहलाती है, जो 2 तरह से होती है-


1. सूर्य – चंद्रमा – पृथ्वी - युति


2. सूर्य – पृथ्वी – चंद्रमा – वियुति


भारत का पूर्वी घाट पर्वतीय क्षेत्र

भारत का पूर्वी घाट पर्वतीय क्षेत्र


पूर्वी घाट भारत में ओडिशा से लेकर तमिलनाडु तक विस्तृत पर्वतीय क्षेत्र है, जोकि वर्तमान में बड़ी-बड़ी नदियों द्वारा विच्छेदित होकर एक असतत श्रंखला के रूप में बदल गया है| पश्चिमी घाट की तुलना में पूर्वी घाट का अपरदन अधिक हुआ है| चेन्नई के दक्षिण-पश्चिम में शेवरोय व पालनी पहाड़ियों के रूप में पूर्वी घाट पश्चिमी घाट से मिल जाता है|


पालिकोंडा, नल्लामला, वेलिकोंडा, पालनी, शेवरोय, जावादी आदि पूर्वी घाट की प्रमुख पहाड़ियाँ हैं| पूर्वी घाट के मध्य भाग में दो समानान्तर पहाड़ियाँ पायी जाती हैं, जिनमें से पूर्वी पहाड़ियों को वेलिकोंडा श्रेणी और पश्चिमी पहाड़ियों को पालिकोंडा-लंकामल्ला-नल्लामला श्रेणी कहा जाता है|भारत के सबसे बड़े बाघ रिजर्वों में से एक, नागार्जुन सागर-श्रीसैलम बाघ रिजर्व, पूर्वी घाट की नल्लामला पहाड़ियों में ही स्थित है| कारांठामलाई (Karanthamalai) पूर्वी घाट के दक्षिणी भाग में स्थित है और सिरुमलाइ (Sirumalai) पहाड़ियाँ  भी दक्षिणी तमिलनाडु में स्थित हैं|


गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, पालार, पेन्नेरु आदि नदियां पूर्वी घाट के आर-पार बहती हुई पूर्वी तटीय मैदान के सहारे अवसादों का निक्षेपण कर बंगाल की खाड़ी में जाकर मिल जाती हैं| इन नदियों के कारण पूर्वी घाट बीच-बीच में से कट गया है और पश्चिमी घाट के विपरीत एक असतत श्रंखला में बदल गया है| इसकी ऊंचाई भी पश्चिमी घाट की तुलना में कम है|


भारत का पश्चिमी तटीय मैदान

भारत का पश्चिमी तटीय मैदान


भारत के पश्चिमी तटीय मैदान का विस्तार गुजरात तट से लेकर केरल के तट तक है| इस मैदान को चार भागों में विभाजित किया जाता है-


• गुजरात का तटीय मैदान गुजरात का तटीय मैदान (इसे कच्छ और काठियावाड़/सौराष्ट्र का तटीय मैदान में बांटा जाता है|)


• कोंकण का तटीय मैदान - महाराष्ट्र व गोवा का तटीय मैदान


• कन्नड़ का तटीय मैदान - कर्नाटक का तटीय मैदान (इसे कनारा तटीय मैदान भी कहा जाता है|)


• मालाबार का तटीय मैदान - केरल का तटीय मैदान


गुजरात का तटीय मैदान का कच्छ का मैदान शुष्क एवं अर्द्धशुष्क रेतीला मैदान है, लेकिन काठियाबाड़ तटीय मैदान (जिसे सौराष्ट्र का तटीय मैदान भी कहा जाता है) से होकर माही, साबरमती, नर्मदा तथा ताप्ती नदियाँ अरब सागर में गिरती हैं। कोंकण के तटीय मैदान पर साल, सागौन आदि के वनों की अधिकता है। कन्नड़ के तटीय मैदान का निर्माण प्राचीन रूपांतरित चट्टानों से हुआ है, जिस पर गरम मसालों, सुपारी, केला, आम, नारियल, आदि की कृषि की जाती है। मालाबार के तटीय मैदान में कयाल (लैगून) पाये जाते हैं, जिनका प्रयोग मछ्ली पकड़ने, अंतर्देशीय जल परिवहन के साथ-साथ पर्यटन स्थलों के रूप में किया जाता है| केरल की पुन्नामदा कयाल में प्रतिवर्ष नेहरू ट्रॉफी नौकायन दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है|


भारत का पश्चिमी तटीय मैदान गुजरात में सबसे चौड़ा है और दक्षिण की ओर जाने पर इसकी चौड़ाई कम होती जाती है, लेकिन केरल में यह फिर चौड़ा हो जाता है| अतः मध्य भाग में ये सबसे कम चौड़ा है| इस मैदान की औसत चौड़ाई 64 किमी. है। इस मैदान का  ढाल पश्चिम की ओर है, जिस पर छोटी-छोटी लेकिन तीव्रगामी नदियाँ प्रवाहित होती है। इस मैदान से होकर बहने वाली नदियाँ डेल्टा नहीं बनाती हैं|


ये मैदान वास्तव में पश्चिमी घाट के पश्चिम में उसके समानान्तर संकरी पट्टी के रूप में विस्तृत निमज्जित तटीय मैदान (Submerged Coastal Plain) हैं|निमज्जन के कारण यह मैदान भारत के समुद्री पत्तनों के निर्माण के लिए आदर्श प्राकृतिक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराता है| कांडला, मुंबई, न्हावा-शेवा, मोर्मुगोआ, मंगलुरु, कोच्चि आदि पश्चिमी तटीय मैदान पर स्थित प्रमुख बंदरगाह/समुद्री पत्तन हैं|


ब्रह्मांड के विषय में बदलता दृष्टिकोण व कृत्रिम उपग्रह

ब्रह्मांड के विषय में बदलता दृष्टिकोण व कृत्रिम उपग्रह


2000 वर्ष पहले, यूनानी खगोलविदों ने सोचा था कि पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में है और चंद्रमा, सूर्य व तारे इसकी परिक्रमा करते हैं।


छठी शताब्दी में आर्यभट्ट ने बताया था कि हम जिन अन्तरिक्ष निकायों को घूर्णन करता हुआ महसूस करते हैं उनका घूर्णन पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूर्णन की वजह से होता है। आर्यभट्ट ने ही इस बात की खोज की थी कि पृथ्वी के घूर्णन की वजह से ही दिन और रात होते हैं। उन्होंने इस बात को भी सिद्ध किया था कि चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण क्रमशः पृथ्वी और चंद्रमा की छाया की वजह से होता है।


15वीं सदी में, पोलैंड के वैज्ञानिक निकोलस कॉपरनिकस ने बताया कि सूर्य सौरमंडल के केंद्र में है और ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं। इस तरह सूर्य ब्रह्मांड का केंद्र बन गया है।


16वीं सदी में, जोहानेस केप्लर ने ग्रहीय कक्षा के नियमों की खोज की, लेकिन सूर्य तब भी ब्रह्मांड के केंद्र में बना रहा। 20वीं सदी की शुरुआत में जाकर हमारी अपनी आकाशगंगा की तस्वीर स्पष्ट हुई और पाया गया कि सूर्य आकाशगंगा के एक कोने में स्थित है।


कृत्रिम उपग्रह


मानव-निर्मित उपग्रह हैं, जो पृथ्वी की चारों तरफ घूमते रहते हैं, को ‘कृत्रिम उपग्रह’ कहते हैं। इन्हें पृथ्वी से प्रक्षेपित किया जाता है। चंद्रमा के मुकाबले ये पृथ्वी के बहुत निकट स्थित होते हैं। कृत्रिम उपग्रहों की डिजाइनिंग और निर्माण प्रौद्योगिकी को वैज्ञानिकों ने करीब 50 वर्ष या इससे थोड़ा पहले विकसित किया था| उन्होंने बहुत शक्तिशाली प्रक्षेपण यान या रॉकेट्स भी विकसित किए जो इन उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने और कक्षा में स्थापित करने में सक्षम होते हैं। फिलहाल दुनिया के सिर्फ कुछ देशों के पास कृत्रिम उपग्रह विकसित करने और उसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने की प्रौद्योगिकी है। भारत भी उन देशों में शामिल है और इसने कई कृत्रिम उपग्रहों को निर्मित कर प्रक्षेपित किया है। भारत का पहला प्रायोगिक कृत्रिम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ था, जिसे अप्रैल 1975 में प्रक्षेपित किया गया था।


कृत्रिम उपग्रहों का प्रयोग कई तरह के कार्यों में किया जाता है। इनका प्रयोग मौसम के पूर्वानुमान में भी किया जाता है। यह हमें मॉनसून के आगमन के बारे में सचेत कर सकते हैं और बाढ़, चक्रवात, जंगल की आग जैसी  संभावित आपदाओं के प्रति भी हमें चेतावनी दे सकते हैं। कृत्रिम उपग्रहों का प्रयोग इंटरनेट, दूरसंचार और रिमोट सेंसिंग/सुदूर संवेदन के लिए भी होता है। रिमोट सेंसिंग (दूर बैठकर जानकारी प्राप्त करने की तकनीक) का प्रयोग मौसम, कृषि, भूमि और महासागर की विशेषताओं के बारे में जानकारी एकत्र करने के लिए किया जाता है। इन प्रायोगिक कार्यों के अलावा कृत्रिम उपग्रहों का प्रयोग वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए भी किया जाता है, उदाहरण के लिए ये खगोलीय पर्यवेक्षण में मदद करने वाले उपकरण अपने साथ अंतरिक्ष में ले जा सकते हैं।


भारत का पूर्वी तटीय मैदान

भारत का पूर्वी तटीय मैदान


भारत के पूर्वी तटीय मैदान का विस्तार पूर्वी घाट और पूर्वी तट के मध्य सुवर्णरेखा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक है| पूर्वी तटीय मैदान का विस्तार पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु राज्यों में है| इस मैदान में निक्षेपों की अधिकता है, क्योंकि गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी जैसी बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित होने वाली बड़ी-बड़ी नदियां सागर में मिलने से पूर्व यहाँ अवसादों का निक्षेपण करती हैं और डेल्टा का निर्माण करती हैं| अवसादों के निक्षेपण के कारण ही यह मैदान पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में अधिक चौड़ा है


पूर्वी तटीय मैदान को दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-पूर्वी मानसून दोनों मानसूनों से वर्षा प्राप्त होती है| चिकनी मिट्टी की प्रधानता के कारण इस मैदान में चावल की खेती अधिक की जाती है| पूर्वी तटीय मैदान में गोदावरी व कृष्णा नदियों के डेल्टा में कोल्लेरु झील स्थित है| चिल्का और पुलिकट झीलें, जोकि लैगून का उदाहरण हैं, भी पूर्वी तटीय मैदान पर स्थित हैं| ओडिशा का तटीय मैदान उत्कल मैदान कहलाता है|


पूर्वी तटीय मैदान को निम्न भागों में बांटा जाता है:


उत्तरी सरकार:गोदावरी व महानदी डेल्टा के बीच का मैदान


आंध्र मैदान:आंध्र प्रदेश का तटीय मैदान


कोरोमंडल:तमिलनाडु का तटीय मैदान


पूर्वी तटीय मैदान पर उत्तर से दक्षिण स्थित प्रमुख डेल्टा निम्नलिखित हैं:


महानदी डेल्टा: ओडिशा


गोदावरी डेल्टा : आंध्र प्रदेश


कृष्णा डेल्टा : आंध्र प्रदेश


कावेरी डेल्टा: तमिलनाडु


पूर्वी तटीय मैदान अत्यधिक अवसाद के निक्षेपण के कारण प्राकृतिक बन्दरगाहों/पत्तनों के विकास के अधिक अनुकूल नहीं है, इसीलिए इस तट पर प्रायः कृत्रिम पत्तन ही पाये जाते हैं| पूर्वी तटीय मैदान का जनसंख्या घनत्व पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में अधिक है| इस मैदान का ढाल अत्यधिक कम है,इसलिए नदियों का प्रवाह धीमा रहता है|


मानसून उत्पत्ति सम्बन्धी जेट-स्ट्रीम संकल्पना

मानसून उत्पत्ति सम्बन्धी जेट-स्ट्रीम संकल्पना


मानसून उत्पत्ति संबंधी जेट स्ट्रीम सिद्धान्त अपेक्षाकृत नवीन और विश्वसनीय सिद्धान्त है| ऊपरी वायुमंडल (9 से 18 किमी.) में प्रवाहित होने वाली तीव्र वायु-प्रणाली को ‘जेट स्ट्रीम’ कहा जाता है| जेट विमानों की उड़ान में सहायक होने के कारण इन्हें ‘जेट स्ट्रीम’ नाम दिया गया है| ये पवनें सामान्यतः पश्चिम की ओर प्रवाहित होती हैं, लेकिन कुछ स्थानीय परिस्थितियों के कारण गर्मियों में पूर्वी जेट स्ट्रीम का उद्भव भी हो जाता है| ऊपरी वायुमंडल में प्रवाहित होने वाली ये पवनें धरतलीय मौसम की दशाओं को प्रभावित करती हैं|


मानसून उत्पत्ति संबंधी अन्य संकल्पनाएँ:


मानसून का भूमध्यरेखीय पछुआ पवन सिद्धान्त


मानसून की तापीय संकल्पना


मानसून के आगमन में जेट स्ट्रीम की भूमिका


सर्दियों के मौसम में भारत या एशिया के ऊपर ‘पछुआ जेट स्ट्रीम’ (जिसे उपोष्ण जेट स्ट्रीम या Subtropical Jet Stream भी कहा जाता है) प्रवाहित होती है, लेकिन तिब्बत हिमालय की उपस्थिति के कारण यह उत्तरी व दक्षिणी दो शाखाओं में बंट जाती है| इसकी उत्तरी शाखा हिमालय व तिब्बत के पठार के उत्तर में प्रवाहित होती है और दक्षिणी शाखा हिमालय के दक्षिण में प्रवाहित होती है|


जब तक पछुआ जेट स्ट्रीम भारत के ऊपर से प्रवाहित होती है, तब तक भारत पर उच्च दाब बना रहता है और वह धरातलीय वायु को ऊपर उठने से रोकती है| इसीलिए मई के मौसम में, जब उत्तर-पश्चिम भारत में अत्यधिक उच्च ताप पाया जाता है तब भी ऊपरी वायुमंडल में पछुआ जेट स्ट्रीम की उपस्थिति के कारण धरातलीय वायु ऊपर नहीं उठ पाती है| धरातलीय पवनों के ऊपर न उठ पाने के कारण उच्च ताप के बावजूद धरातलीय निम्न दाब नहीं बन पाता है और न ही मानसूनी पवनें भारत की ओर आकर्षित हो पाती हैं| पछुआ जेट स्ट्रीम के कारण हवाएँ उत्तर से दक्षिण की ओर अर्थात उत्तर-पूर्वी मानसून के रूप में प्रवाहित होती हैं|


गर्मियों के मौसम में जब सूर्य कर्क रेखा के ऊपर स्थित होता है तो पछुआ जेट स्ट्रीम भी उत्तर की ओर खिसक जाती है और हिमालय के दक्षिण में प्रवाहित होने वाली पछुआ जेट स्ट्रीम की धारा लुप्त हो जाती है| पछुआ जेट स्ट्रीम के लुप्त होते ही भारत के ऊपर पूर्वी जेट स्ट्रीम प्रवाहित होने लगती है| पूर्वी जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति तिब्बत के पठार के गर्म होने से पठार के ऊपर की वायु के ऊपर उठने से होती है, लेकिन पूर्वी जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति अत्यधिक अनियमित होती है|


तिब्बत के पठार के गर्म होने से पूर्वी जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति


पछुआ जेट स्ट्रीम के लुप्त होने और पूर्वी जेट स्ट्रीम के प्रवाहित होने के कारण ही उत्तर-पश्चिम भारत की धरातलीय गर्म पवनें ऊपर उठने लगती हैं और उच्च निम्न दाब का निर्माण हो जाता है, जिसे भरने के लिए मानसूनी पवनें भारत की ओर आकर्षित होती है और मानसून का आगमन हो जाता है| 


 


भारत के द्वीप समूह: अंडमान और निकोबार व लक्षद्वीप

भारत के द्वीप समूह: अंडमान और निकोबार व लक्षद्वीप


भारत के द्वीप समूह को दो भागों में बांटा जाता है: अरब सागर में स्थित ‘अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा बंगाल की खाड़ी में स्थित ‘लक्षद्वीप समूह|


अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह


बंगाल की खाड़ी या अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में लगभग 572 द्वीप स्थित हैं, जिनमें से अधिकांश 6°उ.-14°उ. अक्षांश और 92°पू.-94°पू. देशांतर के मध्य स्थित हैं| इन द्वीपों को दो भागों में बाँटा जाता है:


1. उत्तर में अंडमान द्वीपसमूह


2. दक्षिण में निकोबार द्वीपसमूह


ये दोनों द्वीपसमूह 100 चैनल द्वारा एक-दूसरे से अलग होते हैं|


अंडमान द्वीपसमूह में स्थित प्रमुख द्वीपों का उत्तर से दक्षिण क्रम इस प्रकार है:


उत्तरी अंडमान


मिडिल/मध्य अंडमान


दक्षिणी अंडमान


लिटिल अंडमान


निकोबार द्वीपसमूह में स्थित प्रमुख द्वीपों का उत्तर से दक्षिण क्रम इस प्रकार है:


कार निकोबार


लिटिल निकोबार


ग्रेट निकोबार


ऐसा माना जाता है कि इन द्वीपसमूहों का निर्माण सागर के जल में डूबी पर्वतीय चोटियों के जल के ऊपर आने से हुआ है| इनमें से कुछ छोटे द्वीपों की उत्पत्ति ज्वालामुखी क्रिया से हुई है| भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी ‘बैरन द्वीप निकोबार द्वीप समूह में ही स्थित है|


अंडमान और निकोबार भारत का एक संघशासित/केंद्रशासित प्रदेश है, जिसकी राजधानी साउथ अंडमान में स्थित ‘पोर्ट ब्लेयर है, जोकि भारत के प्रमुख पत्तनों में से एक हैं|इस द्वीपसमूह में भूमध्यरेखीय या विषुवतीय प्रकार की जलवायु व वनस्पति पायी जाती है और संवहनीय वर्षा होती है| सघन सदाबहार वन, प्रकृतिक सुंदरता और जनजातीय जनसंख्या व संस्कृति यहाँ की पहचान है| वर्तमान में यह भारत के एक प्रमुख पर्यटन केंन्द्र के रूप में विकसित हो चुका है| अंडमान और निकोबार ‘कोको चैनल के माध्यम से म्यांमार से और ग्रेट चैनल के माध्यम से इंडोनेशिया से अलग होता है|


लक्षद्वीप समूह


अरब सागर में स्थित द्वीपसमूहों अर्थात लक्षद्वीप का निर्माण प्रवाल संरचना से हुआ है, जोकि 8°उ.-12°उ. अक्षांश और 71°पू.-74°पू. देशांतर के मधी विस्तृत हैं| इन द्वीपों की संख्या 36 है, जिनमें से केवल 11 द्वीपों पर मानवीय अधिवास पाया जाता है| ये द्वीप केरल के तट से 280-480 किमी. पूर्व में स्थित हैं| लक्षद्वीप समूह को दो भागों में बाँटा जाता है:


उत्तर में अमीनीदीवी व कन्नानोर द्वीप समूह


दक्षिण में मिनीकॉय द्वीप


ये दोनों द्वीपसमूह 90 चैनल द्वारा एक-दूसरे से अलग होते हैं और 80 चैनल लक्षद्वीप को मालदीव से अलग करता है| मिनीकॉय लक्षद्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है| लक्षद्वीप भारत का एक संघशासित/केंद्रशासित प्रदेश है, जिसकी राजधानी ‘कावारात्ती है| सुंदर पुलिनों (Beaches) और प्राकृतिक सुंदरता के कारण यह भारत के एक प्रमुख पर्यटन केंन्द्र के रूप में विकसित हो चुका है|


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